क्या गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड प्रधान पद की सौदेबाजी हो रही है?
कौन गद्दार दशमेश पिता का स्थान कब्ज़ाना चाह रहा है?
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हजूरी प्रधान का सपना दिखानेवालों का संघर्ष शुरू !
रविंदर सिंघ मोदी
(यह लेख हजूर साहिब के उन लोगों के लिए हैं जो जागृत नहीं हैं.
यदि पढ़कर सो जाना हैं या व्यर्थ ही चर्चा करना है
तो शायद लेख लिखना एक शोकांतिका मात्र माना जाना चाहिए.
यदि लेख पसंद पड़े तो निश्चित ही आपके हक और अधिकार की लड़ाई में महत्वपूर्ण प्रतीत होगा. )
मुंबई के कुछ व्यावसायिक और आधे राजनीतिक लगातार गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड के ख़िलाफ़ हथकंडे अपना रहे हैं. किसी तरह से गुरुद्वारा बोर्ड का सदस्य पद मिल जाये इस मंशा से वहां का एक समूह पहले कार्य करता था. लेकिन अब उनकी मंशा गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड का प्रधान पद पाना है. क्योंकि हमारी गुरुद्वारा बोर्ड नामक धार्मिक संस्था १९५६ एक्ट में कलम ११ के संशोधन के बाद सरकार के अधीन जो है. सीधी बात है कि ये संस्था अब सरकारी मिलकियत बन गई है. सरकार जिसे चाहिए उसे प्रधान बना सकती हैं. जिसे चाहिए उसे मेंबर बना सकती है. लड़कर तो नांदेड़ के सिखों को मेंबर बनना पड़ता हैं.
बड़े शर्म की बात है कि जिस संस्था का गठन नान्देड़ के वफादार अमृतधारी गुरु सिखों ने करवाया था और उसे सत्ता के रूप में बाहर वाले उपयोग कर रहे हैं. अक्सर चर्चा में सुनने को मिल रहा है कि, मुंबई और नागपुर के लोगों ने मुख्यमंत्री के नाक में दम कर रखा है कि हमें संस्था का प्रधान बनाओ, सदस्य बनाओ. अब तो गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान बनने के लिए वर्तमान मीत प्रधान और मुंबई के व्यवसायी भूपिंदर सिंघ मिन्हास साम, दाम, दंड और भेद अपनाकर मुख्यमंत्री के पीछे लगे हुए हैं कि एकबार मुझे नांदेड़ के गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बना दो. वे मुख्यमंत्री से कह हैं कि फिर एकबार कलम ११ का उपयोग कर मुझे प्रधान बना दीजिये. जाहिर हैं एस.जी.पी.सी. भी इस बात का समर्थन कर रही होगी कि हजूर साहिब तखत पर उनके दो मुंबई निवासी मेम्बरों की सत्ता स्थापित हो जाये. चर्चा है कि मुंबई के ये लोग प्रधान पद पाने के लिए कोई भी दाम चुकाने को तैयार है. विगत दो दिनों से नांदेड़ में इस तरह की चर्चा उफ़ान पर हैं.
ये भी एक संयोग है कि बोर्ड के प्रधान और मिन्हास साहब के साथी सरदार तारा सिंघ भी विगत दो दिनों से नांदेड़ में गुरुद्वारा बोर्ड को लेकर चिंतन कर रहे हैं, क्या उनका पत्ता कटने वाला हैं? तारासिंह चिंतित है इसीलिए कि उनके राजनीतिक भविष्य का अब क्या होगा. नांदेड़ के बहुत से सदस्य उनकी सांत्वना कर रहे थे कि हम आपके साथ हैं. जहाँ - जहाँ तारा सिंह निकले सब उनके आगे पीछे दिखाई देते. अभी भी बहुत से लोगों को उम्मीद है कि तारा सिंह में इस.जी.पी.सी. के मुम्बइया सदस्यों का दांव पलटने का सामर्थ्य है. मुख्यमंत्री के अधिक करीब तो आमदार तारा सिंघ ही हैं फिर भूपिंदर सिंघ मिन्हास की मुख्यमंत्री से निकटता कैसे? वजह गहरी लग रही है. मिन्हास जब भी नांदेड़ पहुंचते है तब मीठी मुस्कान बिखरकर कहते हैं कि कलम ११ और कलम ६ के संशोधन की लड़ाई में मैं आपके साथ हूँ. एकबार तो गुरुद्वारा परिसर के कमरे में उन्होंने हमसे हुई बातचीत में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलवाने का वायदा भी किया था. लेकिन मुख्यमंत्री से मिलवाना तो दूर अब कलम ११ का आधार लेकर स्वयं गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनने की फील्डिंग लगा चुके है ऐसा स्पष्ट हो रहा है.
यदि कोई सिख गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनने के लिए सरकार के साथ सांठ - गांठ के चक्कर में है तो वो हजूर साहिब का गद्दार माना जाये. क्या पद खरीदना वफादार सिखों की परंपरा में शुमार है? एस.जी.पी.सी. इस बात से इत्तेफाक रखती है कि कोई गुरु घर के सीटों की बोली लगाएं ? हजूर साहिब बोर्ड के लिए वर्तमान समय कठिन बना हुआ हैं. महाराष्ट्र सरकार ने गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कानून में जबरन संशोधन कर बोर्ड पर अपना अधिकार कर लिया जो नांदेड़ के सिखों का अधिकार छीनने जैसा हैं. मुखयमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस जी को वर्ष २०१५ में किये गए कलम ११ का संशोधन रद्द करना चाहिए. वहीं कलम ६ और कलम १५ के प्रस्तावित संशोधन भी पीछे लेने चाहिए.
मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे संशोधन रद्द करवाकर नांदेड़ के सिखों के हवाले बोर्ड कर दे. कुछ व्यापारियों ने बोर्ड और रैंन सभाई के नाम पर यहाँ एक कारोबार शुरू किया हैं. तखत के नाम पर कारोबार हरगिज बर्दाश्त नहीं होना चाहिए. यदि कुछ सदस्य चाहते हैं कि मुम्बइया लॉबी की सत्ता यहाँ बनी रहे तो उन्हें हजूरी प्रधान का तुन्तुना बजाने कोई जरुरत नहीं. दूसरी ओर यह जाहिर सी बात है कि हजूर साहिब के जागरूक लोग यदि सोते रह जायेंगे तो गुरुद्वारा बोर्ड के पदों का कारोबार कर, बाहर के लोग सत्ता में आ जायेंगे. चुनावों के बाद तो आपकी नींद खुलनी चाहिए ऐसी अपेक्षा की जा सकती हैं.
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