मेरी ब्लॉग सूची

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

तारासिंह अब तक का सबसे निष्क्रिय प्रधान !
लगभग २०० करोड़ के बजट का नहीं क्या गया उपयोग 
क्या हजूर साहिब बोर्ड को शिरडी ट्रस्ट जैसा बनाया जा रहा हैं?
-------
रविन्दरसिंह मोदी

इससे पूर्व भी मैंने बेबाक तौर पर यह बात कही है कि विधायक तारा सिंह की प्रधानगी नांदेड़ के सिखों के लिए अभिशाप से कम नहीं है. अब मेरी यह बात भी तारा सिंह के समर्थक वर्ग को अप्रिय प्रतीत हो सकती है, जब मैं यह तर्क प्रस्तुत करूँ कि सन १९५६ से अब तक के गुरुद्वारा बोर्ड कार्यकाल में तारा सिंह का विगत पौने चार वर्षों का कार्यकाल सबसे निष्क्रिय साबित हुआ है. पिछले तीन वर्षों में गुरुद्वारा बोर्ड के बजट का ठीक से उपयोग करने में भी तारासिंह बुरी तरह से विफल साबित हुआ है. मैं बेबाक और खरी खरी कह रहा हूँ आप खुद जाँच कर देख लीजिये. 
विधायक तारा सिंह ने अप्रैल २०१५ में महाराष्ट्र सरकार के आदेश से गुरुद्वारा सचखंड मंडल (बोर्ड) का अध्यक्ष पद प्राप्त किया था. पद पर बैठने के बाद जब तारासिंह ने गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड (मंडल) के आर्थिक मामलों का निरिक्षण किया तो उसके अधिपत्य में ६० करोड़ राशि के बजट की संस्था थी. उसके बाद वर्ष २०१६ - २०१७ आर्थिक वर्ष का बजट प्रस्तुत हुआ तो वह बढ़कर ६८ करोड़ हो गया. वर्ष २०१७-२०१८ में बजट की राशि ८८ करोड़ इतनी दर्शाई गई थी. अभी वर्ष २०१८ - २०१९ का जब वार्षिक बजट प्रस्तुत हुआ तो यह अकड़ा बढ़कर ९५ करोड़ हो गया. वर्ष २०१५-१६ से वर्ष २०१८-१९ इन चार सालों का आर्थिक प्रारूप कहता हैं कि चार वर्षों में दो सौ करोड़ से तीन सौ करोड़ की राशि खर्च करने का अवसर था. जो तारा सिंह ने गंवाया हैं. इस राशि के उपयोग से नांदेड़ शहर में छह भव्य मार्केट इमारतों का निर्माण हो सकता था. वही लगभग ५० एकड़ जमीन खरीदी जा सकती थी. तारा सिंह ने कोई संपत्ति खड़ी नहीं की. क्यों? सोचिए?

तारासिंह के कार्यकाल में प्रस्तावित और अनुमानित आर्थिक व्यवहार की संभावित सीमा तीन सौ करोड़ (३०० करोड़) से ज्यादा की है. उसी तरह से पिछले तीन वर्षों का शुद्ध बजट देखा जाए तो लगभग २०० करोड़ रूपयों का व्यवहार प्रभावित हुआ है. बोर्ड के पास इतना बड़ा विकल्प होने के बावजूद भी तारासिंह ने अध्यक्ष के नाते इस बजट का उपयोग ठीक तरह से नहीं किया. तारासिंह ने भूमिपूजन तो दो से तीन स्थानों पर किये लेकिन प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हुए. तारासिंह के कार्यकाल में गुरुद्वारा बोर्ड के धन राशि से कोई नयी ईमारत, मार्किट, काम्प्लेक्स, गुरुद्वारा, डेवढ़ी, बाथरूम, रोड या कोई छत का निर्माण हुआ हो तो बताइयेगा. इतनी जमीनें उपलब्ध होने के बावजूद उसने कोई भी स्ट्रक्चर खड़ा नहीं किया. क्योंकि एक तो उसके पास विज़न (दूरदृष्टि) नहीं, दूसरे इच्छाशक्ति नहीं, तीसरे फुट डालों झगडे कराओ की राजनीति और चौथे केवल सरकारी अध्यक्ष होने का रौब. इस कारण उसने कोई गुरु घर का पैसा बैंकों में ब्लॉक रखा.
अब जायजा लेते है उन कुछ कामों का जो उसने करवाएं. पहले नम्बर पर चिल्ड्रन पार्क का काम. यह कार्य उसने मुंबई के अपने निकटतम व्यक्ति से करवाया. यह विषय भी काफी चर्चा में रहा था. तारा सिंह ने दूसरा काम करने में रूचि दिखाई वो है श्री गुरु गोबिंद सिंघजी म्यूजियम के अधूरे कार्यों के विषय में. तारा सिंह के पद लेने के बाद खर्च की कोई सीमा ही नहीं रही. जो वस्तु १० रुपयों की थी वो मान लीजिये ५० रुपयों में खरीदी गई. खर्च और मरम्मत कार्यों का खर्च लाखों में होने की बात सामने आयी हैं. जिसमे ठेकेदार को अग्रिम धन देने का मामला भी चर्चा में रहा हैं. म्युझियम में कितने के कार्य करवाएं गएँ, किसके ऑब्जरवेशन में करवाएं गए, अभी और कितना खर्च करना हैं जैसे प्रश्न खड़े हैं. जाहिर हैं तारा सिंह तो जवाब नहीं देगा. सरकार भी धांधलियों की जाँच नहीं करवाएंगी. 
खैर मुद्दे पर आते हैं, दशमेश अस्पताल में संसाधन बढ़ाने के पहले के बोर्ड के निर्णय पर उसने कुछ खर्च किया. छोटे-मोटे स्लाइडिंग, पार्टीशन, बॉउंड्री वॉल, खालसा हाई स्कूल , सचखंड पब्लिक स्कूल रिनिवेशन, वृद्ध आश्रम के कमरों को अधिकारियों  का निवास स्थान बनाने के लिए रेनोवशन में खर्च, तोड़फोड़ आदि कार्य कर उसने कुछ करोड़ व्यर्थ किये ऐसा आरोप स्वयं बोर्ड के मेंबर ही लगा रहे हैं. तारा सिंह ने कोई ईमारत खड़ी नहीं की.  यात्री निवास नहीं बनाया.  उत्पन्न बढ़ाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की. 
बोर्ड की बैठकें मुंबई में लेकर तीन से साढ़े तीन वर्षों में करोड़ों का खर्च करवाया. मुंबई  बैठकें हुई, उनमें क्या प्रभावी निर्णय हुए? बोर्ड का उत्पन्न तो नहीं बढ़ा उलटे खर्च ज्यादा हुए. तारा सिंह जब जब नांदेड़ दौरे पर आया तो दौरा खर्च भी बढ़ गया. अख़बारों में विज्ञापन छपवाकर गुरुघर में खुद का दरबार आयोजित किया गया. बैनर और पोस्टर में भी अब तक करोड़ के निकट खर्च हुए होंगे. अभी भी आवश्यक खर्च जारी हैं. 
उसने अपने रिश्तेदारों को ऊँचे पैकेज पर डायरेक्टर बनाया. जहां जगह नहीं थी वहां भर्ती करवाई. चार महीनों में चार सौ कर्मचारी भर्ती करते समय बोर्ड मीटिंग में किसी तरह का कोई प्रस्ताव पास नहीं किया. नयी भर्ती किये गए कर्मचारियों का प्रति माह अंदाजा ३३ लाख रुपयों के वेतन की अतिरिक्त व्यवस्था नहीं की गई बल्कि गोलक से ही वो खर्च किया जा रहा हैं. ऊपर से इतने कर्मचारियों को भविष्य में स्थाई (परमानेंट) नौकरी का आश्वाशन भी नहीं दिया गया, क्योंकि सभी को डेलीवेजस पर नहीं बल्कि कॉन्ट्रैक्ट टाइप नौकरिया बांटी गई. किसी भी कर्मचारी को भर्ती के साथ पद बहाल नहीं किये गए. स्थाई कर्मचारियों को रोटेशनल प्रमोशन नहीं दिए गए जो कि उनका हक्क और अधिकार बनता हैं. वरिष्ठ कर्मचारी प्रमोशन से वंचित हैं. उनके साथ सरासर अन्याय किया गया. तारा सिंह ने उनकी बात तक नहीं सुनी. बोर्ड में कार्यरत महिला कर्मचारियों को प्रमोशन में न्याय नहीं दिया गया. उल्टा महिला शोषण बढ़ने के समाचार सुनने में आते रहे हैं. तारा सिंह के निकटवर्तीय की जाँच के लिए महिला और बाल उत्पीड़न पथक ने छानबीन भी की हैं. यानी तखत की गरिमा बनाये रखने में वो पूरी तरह से विफल साबित हुआ हैं. 
क्या निष्क्रिय प्रवृत्ति का व्यक्ति दुबारा प्रधान बनना चाहिए?
तारा सिंह के प्रधान राज्य में क्या विकास किया गया साध संगत को आज खुलकर बताया जाये यह सभी की मांग हैं. सरकारी नुमाईंदा होने और चार सालों का आर्थिक बजट हाथ में रहते हुए भी उसने कोई बड़ा काम नहीं किया. इतना बजट उसने ब्लॉक क्यों रखा उसका सच बाहर आना चाहिए. आगे भी तारा सिंह प्रधान बनने के लिए पासे बिछा चूका हैं. जो लोग गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव लढ रहे हैं, उन्होंने हजूरी प्रधान का विषय गंभीरता से लेते हुए तारा सिंह से सवाल करना चाहिए कि पिछले पौने चार सालों में उसने बजट ब्लॉक क्यों रखा? क्या शिरडी ट्रस्ट की तरह ही सरकार को लोन देने की कोई गुप्त योजना हैं? क्या फिक्स डिपॉजिट्स पर किसी को लोन की सिफारिश की गई हैं? विकास नहीं करना था तो पद पर बैठकर हजूर साहिब  झगडे लगाने की क्या जरुरत थी? तखत साहब पर मेम्बरों को कसम खिलने की क्या जरुरत थी?
हजूर साहिब के लोगों का दुर्भाग्य कहा जाना चाहिए की १९५६ से लेकर आज तारीख तक केवल १६ साल ही हजूरी प्रधान पद पर रहे. जिनमें से नांदेड़ के केवल दो ही प्रधान रहे जिन्होंने साढ़े नौ साल प्रधान पद पर निकला. बाकी समय यानी पचास वर्षों के करीब बाहरवालों ने, कलेक्टर ने और प्रशासकों ने यहाँ की सत्ता संभाली हैं. फिर भी हजूर साहिब के बाशिंदे जो कहते हैं कि गुरु हाजिर नजीर हैं, वो नहीं चाहते कि गुरुघर में स्थानीय प्रधान बनें. गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव में २२ उम्मीदवार खड़े हैं जिनमे से कुछ डम्मी माना जाएं तो भी आठ से नौ उम्मीदवार मैदान में हैं. सभी योग्य हैं और राजनीती समझते हैं. मैं किसी उम्मीदवार के लिए व्यक्तिगत नहीं कह रहा हूँ चयन संगत का अधिकार हैं. सभी उम्मीदवार चाहते हैं हजूरी प्रधान बनें. लेकिन प्रत्यक्ष में बनाने के हालत में कोई नहीं दिखता. क्योंकि उनकी मानसिकता स्थिर हो गई हैं कि बोर्ड पर बाहर वालों का राज कायम रखना है. जाहिर हैं सरकारी नियुक्ति की प्रथा के रहते यहाँ का प्रधान चुनने का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता. इस समस्या का हल किसके पास हैं? जो सबसे योग्य उम्मीदवार है वो यह जाहिर करें. 
क्या वर्तमान में त्यागपत्र देकर भी गद्दी पर बैठा निष्क्रिय प्रधान दुबारा से प्रधान बनना चाहिए? क्या सरकार यहाँ निष्क्रिय व्यक्ति लादकर सचखंड बोर्ड को भी शिरडी ट्रस्ट जैसा बना रही जहां सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहे? और तारा सिंह इसी छुपे अजेंडे पर काम कर रहा हैं?
----------
अपनी प्रतिक्रियां जरूर दर्ज करवाएं.... सच लगे तो शेयर कीजिये... 

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

हजूरी प्रधान कैसे ?
फिर प्रधान बनने के लिए तारासिंह की तडजोड़ शुरू 
बोर्ड पर स्थापित होगा मुम्बईया राज?
-------
रविन्दरसिंघ मोदी 
जब तक मुख्यमंत्री श्रीमान देवेंद्र फडणवीस जी का आँख बँधकर समर्थन कायम है तब तक भाजपा के विधायक और गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड नांदेड़ के सरकारी प्रधान तारा सिंह का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता यह तो स्पष्ट हो चला है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उनकी हर गलती, नादानी, मनमानी, अफरा-तफरी और साजिश को नजर अंदाज कर रहे हैं. गुरुद्वारा सचखंड के प्रबंधन में उन्हें जी.पी.सी. के मेंबर उनके हुकुम के आगे नतमस्तक दिखाई दे रहे है. 
इस कुशल हुकुमरान ने हजूर साहिब में नौकरियां बांटकर सब सिखों की जुबानें सील दी हैं. प्रमोशन तो मिठाई जैसी बाँट कर उन्होंने नियमों को तक पर रख दिया. उनके खिलाफ कितनी भी शिकायतें कर लीजिये उनको पद से कोई नहीं हटा सकता। भाजपा के इस विधायक के पीछे सरकार खड़ी हो जाने से उसकी मनमानी इतनी बढ़ गई कि गुरु घर के प्रबंधन में सैकड़ों गलतियाँ कर दी. नुकसान कर दिया. गोलक पर खर्च लाद दिया और सच्चा सुच्चा बनने का नाटक करना शुरू कर दिया. भाजपा के ईमानदार सरकार द्वारा लादे हुए इस प्रधान ने गुरुघर के प्रबंधन को उसने किसी निजी ट्रस्ट की सत्ता जैसा हाँकना शुरू कर दिया. आज भी हाँक रहा हैं. शायद उसे मरने तक भी यहाँ का प्रधान बना रहना है. अब तो उसके साथ इस.जी.पी.सी. की मुंबई की हस्तियाँ और दशम की विरोधी भी कंधे से कन्धा लगाकर काम कर रहे हैं. सभी की यही इच्छा है कि हजूर साहिब में हजूरी प्रधान नहीं बनना चाहिए. 
अब तो औरंगाबाद में भी यही बात फैलाई जा रही हैं की यहाँ हजूरी प्रधान ठीक नहीं हैं. इसलिए मुंबई वालों की सत्ता हजूर साहिब में स्थापित होनी चाहिए. बहुत सी शक्तियाँ इस काम में जुट गई हैं कि हजूरी प्रधान ना  बन पाएं और कलम ग्यारह (११) सरकार के अधीन रखकर ही हजूर साहिब बोर्ड का प्रशासन चलाया जाना चाहिए. और यह काम तारा सिंह के लिए कोई कठिन नहीं हैं. मुंबई से औरंगाबाद और वहाँ से हजुरसाहिब तक उसने अपना नेटवर्क मजबूत कर लिया हैं. अपना नेटवर्क मजबूत करने के लिए उनसे भाजपा को पहले दूर कर दिया. उसने कांग्रेस के कुछ मोहरों को मैदान में उतारा. कुछ पढ़े लिखों को पदों का लालच देकर अपने साथ कर लिया. दीवान ख़त्म करने की धमकियां देकर एक गुट को खामोश कर दिया तो दूसरें को उत्साहित कर दिया. 
अब गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव में वो अपने तीन मेंबर चुनकर लाने के प्रयास में हैं. उसकी नीति और राजनीति हजुरसाहिब की संगत के आगे कामयाब लग रही हैं. हो सकता हैं कि चुनाव के बाद तारासिंह अपने साथ मुंबई के दो से तीन मेंबर बोर्ड में लेकर आ जाएँ. पिछली बार जिनकों सरकार द्वारा मनोनीत कर दिया गया था शायद उनके स्थान पर मुंबई और नागपुर से  कोई मेंबर बनकर आये. और हजूर साहिब के स्वाभिमानी सिख उन्हें "साहब" "साहब" कहकर सिरमात्थे लगा ले.    
 स्मरण होगा कि अपने इसी राजनीतिक बल और राजनीतिक पहुँच के कारण ही तारासिंह ने गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कानून १९५६ (कलम ११) में जबरन संशोधन करवाकर गुरु घर का सरकारीकरण करवा दिया था और हम कुछ नहीं कर पाए थे. बाहुबली तारासिंह सिंह यही तक नहीं रुके उन्होंने तो बाद में प्रधान का कोरम मुंबई में बैठे बैठे प्राप्त करने के लिए गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट १९५६ में कलम ६ में भी संशोधन करवा दिया.  यह संशोधन पीछे लेने के लिए उसके खिलाफ आंदोलन किया गया. पर उसने कुशलता से उसे दबा दिया. इस आंदोलन को निरस्त करने करने के लिए उसने साम दाम दंड भेद का सहारा लिया. यहाँ तक कि संतों की अपील पर भी उसने संशोधन पीछे नहीं लिया. क्योंकि उसे अपनी राजनीतिक ताकत केवल गुरुघर के खिलाफ ही उपयोग में लाना था. इस पगड़ीधारी विधायक ने अपनी राजनीतीक साख गुरु घर के सरकारी कारण करने में खर्च कर दी. अब बोर्ड की चाब्बीयां भी सरकार को सौंपने की उसकी तैयारी दिखाई दे रही हैं. 
औरंगाबाद से खेल शुरू !!
(औरंगाबाद में २० दिसंबर को कलम ग्यारह के समर्थक मुंबई के मेंबर चुनाव प्रचार करते हुए.) 
औरंगाबाद में उसने गुरुवार ता. २० दिसंबर को गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव का प्रचार किया लेकिन भाजपा के लिए नहीं. उसने स्पष्ट कहा हैं कि नांदेड़ के एक उम्मीदवार को वोट दे बाकी दो यही के उम्मीदवारों को वोट दे. यानी वो नांदेड़ और औरंगाबाद के मतदाताओं में सीधी फूट डालना चाह रहा हैं. उसके साथ प्रचार में इस.जी.पी.सी. के मेंबर भी थे, मीत प्रधान भूपिंदर सिंह मिन्हास और गुरविंदर सिंह बावा,. इकबाल सिंह, सुरजीत सिंह भी प्रचार बैठक में शामिल थे. विधायक तारा सिंह की ऐसी नीतियाँ हैं तो हजुरसाहिब के सिखों को भी सोचना चाहिए कि उनका भविष्य क्या होगा? तारा सिंह को निष्पक्ष रहना चाहिए थे या भाजपा के उम्मीदवार खड़े करने चाहिए थे. मुख्यमंत्री जी तारा सिंह से और क्या करवाना चाहते हैं आप?  वर्ष २०१५ से आपने हमारा बोर्ड अधिग्रहित कर लिया हैं. अब बोर्ड बर्खास्त करना था लेकिन नहीं किया. तारासिंह का इस्तीफा क्यों लिया गया? सरकार का बल लेकर वो अब नान्देड़ के सिखों के साथ खेल खेल रहा हैं. आपस में एक दूसरों को लड़ा रहा हैं. ऐसे में हजूरी प्रधान कैसे बनेगा? 
(विधायक तारा सिंह औरंगाबाद में चनाव प्रचार में अपना सिक्का जमाते हुए. )
इस चुनाव में भी विधायक तारासिंह सभी को चॉकलेट दे रहा हैं. जिनका प्रचार कर रहा है उन्हें भी बेवकूफ बना रहा हैं. वो किसी भी हाल में हजूरी प्रधान बनने नहीं देगा. चुनकर आनेवाले मेंबर उसकी गोद में बैठकर राजनीति नहीं करेंगे, इसकी क्या गारंटी? चाहे कोई भी स्थानीय व्यत्कि मेंबर बनें, कोई भी हजूर साहिब निवासी का निवासी प्रधान बनें हमे आपत्ति नहीं. ना विरोध होगा. सभी को अधिकार है वो प्रधान बनें , मेंबर बनें. लेकिन गुरुघर के, तारासिंह के नहीं. इसलिए जो लोग तारासिंह का सहारा ले रहे हैं उन्हें उसकी कोई जरुरत ही नहीं हैं. अपनी काबिलियत पर चुनकर आये हम स्वागत करेंगे. आपका काम आपको सफलता देगा. लेकिन यदि आप तारा सिंह के लिए चुनकर आना चाहते हैं तो आपकी राजनीतिक कुशलता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाता हैं. हजूर साहिब की भोली भली संगत का भविष्य दाँव पर लगाना किसी हाल में भी उचित नहीं होगा. तारा सिंह ने गुरुघर का सरकारीकरण कर पाप ही किया हैं उसके पाप में  हजूर साहिब का कोई भी भागीदार ना बनें यही प्रार्थना हैं.  
(आपकी प्रतिक्रिया जरूर दें..... और इस पोस्ट को आगे शेयर करें. ....) 

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड चुनाव का 
प्रचार जोरों में... 
रविंदर सिंघ मोदी  


तखत सचखंड श्री हजूर साहिब बोर्ड के तीन सदस्य पदों के लिए आगामी २८ दिसंबर को आयोजित चुनाव के लिए उम्मीदवारों की प्रचार यंत्रणा सक्रीय हो गई हैं. चुनाव मैदान में हालाँकि २६ उमीदवार हैं लेकिन जिनमें से कुछ डमी प्रत्याशी हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने केवल समर्थन घोषित करने के लिए अपना परचा भरा हैं. लेकिन चुनाव मैदान में असल में सोलह (१६) उम्मीदवार ही अंत तक लड़ेंगे ऐसा प्राथमिक चित्र दिखाई दे रहा हैं. संभव हैं की अंत तक केवल ग्यारह (११) लोग ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में दिखाई दे.

जो उम्मीदवार चुनाव लड़ा  रहे हैं उनमें रणजीत सिंह कामठेकर, गुरमीत सिंघ महाजन, रविंदर सिंह बुंगई, कुँजीवाले मनप्रीत सिंह, तेजपालसिंह खेड़, धूपिया जसबीर सिंह, अवतारसिंह पहरेदार, जोगिन्दर सिंह रामगाड़िया, गुलाटी हरचरण सिंह गोबिंदसिंह, ओबेराय ऋषिराज सिंह, कौशल परविंदर सिंह जगजीत सिंह, गाड़ीवाले कर्नलसिंघ, गुलबीरसिंघ नवाब, हरप्रीत सिंह लांगरी, दिगवा हरभजनसिंह, प्रकाश सिंह कान्सा यह अपने स्वयं के लिए मतदान मांग रहें हैं. 
इच्छुक लेकिन अन्य के लिए प्रयासरत उम्मीदवारों में संभाव्य उम्मीदवार के रूप में अथवा डमी के रूप में बलजीत सिंह बावरी, हरदीपसिंह घड़ीसाज, पेशकर परमजीत सिंह, प्रेमजीतसिंघ सुखाई, तेजवंत सिंह संतोकसिंघ रागी, पुजारी सतनामसिंह, बाठ हरप्रीतसिंघ के नाम चर्चा में हैं. 

अधिकतर उम्मीदवारों ने अपना चुनाव प्रचार आरम्भ कर दिया हैं. पूर्व बोर्ड सचिव और वर्त्तमान मेंबर रणजीत सिंह कामठेकर द्वारा बगैर पैनल के अकेले उम्मीदवार के रूप में भाग्य आजमाया जा रहा हैं. बोर्ड मेंबर गुरमीतसिंह महाजन भी अकेले चुनाव मैदान में हैं. मैनेजिंग मेंबर रविंद्र सिंह बुंगाई भी अपने बुते पर अकेले लड़ रहे हैं. हजूरी क्रांति संघटन के उम्मीदवार मनप्रीत सिंह कुँजीवाले भी अकेले चल रहे हैं. शिवसेना के नेता अवतारसिंह पहरेदार और जोगिंदर सिंघ रामगडिया भी बगैर किसी पैनल के मैदान में हैं. 

उधर चुनाव की दृष्टी से महत्वपूर्ण माने जानेवाले औरंगाबाद के निवासी उम्मीदवारों में सबसे अनुभवी हरचरण सिंघ गुलाटी, नए उम्मीदवार कौशल परविंदर सिंघ और प्रकाशसिंघ कान्सा अकेले के बलबूते चुनाव मैदान में हैं. जो उम्मीदवार स्वयं के बुते चुनाव में हैं उनकी रणनीति थर्ड ऑप्शन की रही हैं. यह नीत्ति बहुत बार कारगर साबित होती हैं लेकिन चुनावी हवा में नुकसान भी पहुंचाती हैं. इसलिए यह नीति एक गैम्बल जैसी प्रतीत हो रही हैं. 
एकमात्र पैनल : 
इस चुनाव में एकमात्र पैनल बना है. इस पैनल का नाम "हम चाकर गोबिंद के " रखा गया हैं. जिसमें तेजपाल सिंघ खेड़ (नांदेड़), गुलबीरसिंघ नवाब (नांदेड़) और ऋषिराज सिंह ओबेराय (औरगांबाद) का समावेश हैं. तेजपालसिंह खेड़ को पिछले चुनावों में बड़ी संख्या में वोट मिले थे पर वे कुछ वोटों से चुनाव में असफल साबित हुए थे. जिसके कारण इस बार उन्होंने ने पैनल की रणनीति को अमल में लाया हैं. 

प्रचार की शुरुवात जोरों में 
गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव के प्रचार तंत्र की शुरुवात जोरों में हुई हैं. उम्मीदवारों ने पोस्टर और पर्चों के साथ अपने प्रचार यात्रा की शुरुवात हुई हैं. अधिकतर उम्मीदवारों ने अपने प्रचार की नांदेड़ जिले में पहली फेरी पूर्ण कर ली है. शहरी और ग्रामीण मतदाताओं से मेलमुलाकत कर अपनी निशानियाँ और चुनावी पत्रक का वितरण शुरू कर दिया हैं. गुरुद्वारा मार्ग, चिखलवाड़ी, बड़पुरा, अबचलनगर कॉलोनी, यात्रिनिवास सहित अन्य स्थानों पर चुनावी पोस्टर और बैनर लग गए हैं. कुलमिलकर विधानसभा चुनावों जैसा यहाँ चित्र दिखाई दे रहा हैं. 
--------
रविंदर सिंघ मोदी 
(यह समाचार व्हाट्सअप ग्रुप पर शेयर करे जी.)

गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

समाचार 
हजूर साहिब बोर्ड चुनाव में २६ प्रत्याशी मैदान में 
-------
१२ उम्मीदवारों ने नामांकन पीछे लिए 
२८ दिसंबर को होगा मतदान. 
-----
रविन्दरसिंघ मोदी 
श्री हजूर साहिब, नांदेड़ स्थित गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड की तीन सीटों के लिए आयोजित चुनाव के मैदान में अब २६ प्रत्याशी रह गए हैं. ता. ६ दिसंबर की दोपहर ३ बजने तक नामांकन पर्चा पीछे लेने की अंतिम अवधि थी. जिसके तहत बारह प्रत्याशियों ने अपने पर्चे पीछे ले लिए. भले ही चुनाव में दमदार प्रत्याशी शामिल नहीं है लेकिन परिस्थिति बड़ी रोचक हो गई हैं. ता. २८ दिसंबर को मतदान होगा. जिसके लिए मराठवाड़ा के नांदेड़, औरंगाबाद, उस्मानाबाद, बीड, जालना, परभणी, हिंगोली, लातूर और चंद्रपुर जिले के तीन तहसीलों के मतदाता मतदान करेंगे. सूचि में १२ हजार सात सौ से अधिक मतदाताओं का समावेश हैं. 
पर्चे पीछे लेने के बाद चुनाव मैदान में २६ उमीदवार खड़े हैं, जिनमें रणजीत सिंह कामठेकर, गुरमीत सिंघ महाजन, रविंदर सिंह बुंगई, कुँजीवाले मनप्रीत सिंह, तेजपालसिंह खेड़, धूपिया जसबीर सिंह, अवतारसिंह पहरेदार, जोगिन्दर सिंह रामगाड़िया, गुलाटी हरचरण सिंह गोबिंदसिंह, ओबेराय ऋषिराज सिंह, कौशल परविंदर सिंह जगजीत सिंह, गाड़ीवाले कर्नलसिंघ, गुलबीरसिंघ नवाब, हरप्रीत सिंह लांगरी, दिगवा हरभजनसिंह, बलजीत सिंह बावरी, हरदीपसिंह घड़ीसाज, पेशकर परमजीत सिंह, प्रेमजीतसिंघ सुखाई, प्रकाश सिंह कान्सा , तेजवंत सिंह संतोकसिंघ रागी, पुजारी सतनामसिंह, बाठ हरप्रीतसिंघ आदि का समावेश हैं. 
नामांकन पीछे लेनेवालों में वर्तमान सदस्य शेरसिंघ हीरा सिंह फौजी, मोहनसिंह गाड़ीवाले, रामगडिया गुरदेवसिंघ, ओबेराय जसपालसिंह, ओबेराय ओंकारसिंह, बावरी ठाकुर सिंह, सेना गुरमीतसिंह, खैरा जोगेंद्र सिंह, बुंगाई रघबीर सिंह, चाहेल तेजपालसिंह और राजसिंघ फौजी का समावेश हैं. शेरसिंघ फौजी वर्तमान बोर्ड में सदस्य हैं. चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में रणजीत सिंह कामठेकर, गुरमीत सिंह महाजन बोर्ड में सदस्य हैं. जबकि रविंदर सिंह बुंगाई मैनेजिंग कमिटी में मेंबर हैं. 
----------
इस चुनाव में बड़ी हस्तियों द्वारा दुरी बनाये हुए हैं जो सामान्य मतदाताओं में चर्चा का विषय बन गया हैं. गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान के रूप में सरकार द्वारा सीधी नियुक्ति किये जाने के कारण अधिकतर संगत में रोष व्याप्त हैं. उसी तरह से बोर्ड चुनाव जितने के लिए अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल और सरकार हस्तक्षेप के कारण भी समझदार सिख चुनाव से दूर ही दिखाई दे रहे हैं.  
----------

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

पुलिस द्वारा की गई अमानवीय पिटाई में सिखलीगर सिख की मौत 
कौन खड़ा रहेगा सिखलीगरों के उत्थान के लिए ? 
------------
रविंदर सिंघ मोदी

महाराष्ट्र पुलिस ने बेहद शर्मनाक और अमानवीय घटना को अंजाम दिया हैं. मराठवाड़ा संभाग के परभणी शहर के पास बलसा गांव में ता. १ दिसंबर की सुबह कत्ता सिंघ पिता जसमत सिंघ दुदानी नामक ५० वर्षीय सिखलीगर सिख की पुलिस द्वारा डंडे बरसाएं जाने के बाद मौत हो गई. ये गरीब सिख परिसर के एक गुरुद्वारा और निशान साहिब को तोड़ने से मना कर रहा था. 
प्राप्त जानकारी के मुताबिक मुताबिक ता. एक दिसंबर की सुबह परभणी शहर से सटे पिंगली इलाके में बलसा ग्रामपंचायत में कैनाल किनारे सिचाई विभाग की सरकारी जमीन पर से पुलिस और प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने की मुहीम शुरू की गयी. सुबह लगभग ९ बजे के समय सरकारी अतिक्रमण पथक पुलिस को लेकर वहाँ पहुंचा. पथक के कर्मचारियों ने आव देखा ना ताव देखा मकान तोड़ने शुरू कर दिए. 
अतिक्रमण पथक द्वारा प्रोक्लीन (जे.सी.बी.) मशीन की सहायता से मकान हटाने शुरू किये गए. यह मशीन जैसे ही निशान साहिब के पास पहुंची कत्तासिंघ ने निशान साहिब तोड़ने का विरोध किया. कत्तासिंघ दुदानी ने निशान साहब का कसकर पकड़ लिया और कहा कि यह हमारा पावन चिन्ह हैं इसे न तोड़े. तब पुलिस ने सत्ता सिंघ पर लाठियां भांजनी शुरू कर दी. उसकी सहायता के लिए दूसरे लोग पहुंचे लेकिन पुलिस ने लाठीचार्ज करते हुए सभी की धुनाई कर दी. उन्होंने महिलाओं को भी नहीं बक्शा. कत्ता सिंघ अभी भी निशान साहब से चिपका हुआ था तो उसकी पीठ और सिर पर पुलिस ने डंडे बरसायें. जिससे वो बेहोश हो गया. 
पुलिस ने उसे खींचकर दूर किया. लेकिन जैसे ही ये संकेत मिले की वो गंभीर रूप से घायल हो चूका है तो लाठी चार्ज बंद कर पुलिस ने उसके परिवार से वायरल हुए हैं. 
परिवार ने कुछ युवकों के साथ मिलकर आखरी सांसें गिन रहे कत्ता सिंघ को तुरंत परभणी शहर के सरकारी अस्पताल में उपचार हेतु भर्ती करवाया लेकिन उपचार के चलते ही रात में उसकी मौत हो गई. जिसके बाद जैसे सिखलीगर समाज में मातम सा फ़ैल गया. 
-------------
घटना के बाद सिखलीगर समाज को तुरंत सहायता नहीं मिल पायी. पुलिस ने बहुत डराया. जिला प्रशासन ने भी उल्टा मामला बनाने और अपने अधिकारी एवं कर्मचारियों को तथा मारपीट में शामिल पुलिस के अधिकारी और पुलिस को बचाने का बहुत प्रयास किया. 
--------
ता. ३ दिसंबर को गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदर सिंघ मिन्हास, गुरुद्वारा मेंबर गुरमीत सिंह महाजन, सरजीत सिंघ गिल, रणजीत सिंह कायहाँ की जमींन पर विगत तीस वर्षों से सिखलीगर समाज के लगभग ३० परिवार मकान बनाकर रह रहे थे. उनके द्वारा वहाँ पूजापाठ के लिए एक गुरुद्वारा भी उनके द्वारा बनाया गया था. गुरुद्वारा परिसर में एक बड़ा निशान साहिब लगाया गया था. विगत तीस वर्षों से यहाँ के निवासी टैक्स भी चूका रहे हैं. 
 कहामठेकर, डी.पी. सिंह, गुरविन्दर सिंह वाधवा, सुखविंदर सिंह हुंदल, गुरप्रीत सिंह सोखी, कर्नल सिंह गाड़ीवाले, गुरमीत सिंह बेदी, मनप्रीत सिंह कुँजीवाले, जसपाल सिंह गाड़ीवाले सहित बड़ी संख्या में सिख समाज के लोग घटनास्थल पर पहुंचे. बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदर सिंह मिन्हास ने मृतक के परिवार की सांत्वना की. बोर्ड मेम्बरों द्वारा यह निर्णय भी अवगत करवाया गया कि हजूर साहिब बोर्ड द्वारा मृतक के परिवार को एक लाख की आर्थिक सहायता की जाएगी. साथ ही जिन परिवारों के मकान तोड़ दिए गए हैं उन्हें २५ हजार की मदत की जाएगी. साथ ही खुले में पड़े परिवारों के लिए सचखंड बोर्ड एक महीने तक दोनों समय का लंगर लगाएगा. 
---------
इस घटना से मराठवाड़ा के सभी जिलों में सिखलीगर परिवार रोष में है. सरकार द्वारा बगैंर सुचना के इस तरह से ठण्ड के दिनों में मकान तोड़ दिए जाने से महिला और छोटे बच्चे भी खुले में आ गए हैं. ता. २ दिसंबर को परभणी के जिला कलेक्टर को साधसंगत की ओर से एक ज्ञापन सौपकर मामले की जाँच कराने और गरीब सिखलीगर समाज को दुबारा मकान बनाकर देने की मांग की गई. इस समय जिलाधीश कार्यालय के सामने नारेबाजी की गई. 
---------
कौन लड़ेगा सिखलीगरों के लिए : 

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न ये उठ रहा हैं कि महाराष्ट्र प्रदेश में सभी ओर सिखलीगर समाज उपेक्षित और वंचित हैं. बार - बार ये समाज पुलिस बर्बरता से कांप जाता हैं. पुलिस भी सिखलीगर को पकड़कर पहले पिटाई कर देती है बाद में पूछताछ करती हैं. सिखलीगर समाज पर हुए अन्याय को लेकर लड़ने के लिए उस संभ्रांत सिखों की जरुरत हैं जो स्वयं को उच्च प्रति के सिख मानते हैं. हालांकि सिखलीगर समुदाय ऐसा है जो केश और ककार रखता हैं. सिखलीगर समाज ने कभी केश कत्तल कर सिक्खी छोड़ी नहीं. १९८४ के कठीण दौर में भी सिखलीगर समाज ने सितम झेले पर सिक्खी नहीं छोड़ी. सिखलीगर समाज के उत्थान के लिए सिख समाज को एकजुट होकर लड़ने की जरुरत हैं. हजूर साहिब के सिक्खो पर बहुत कुछ निर्भर करता हैं. राजनीति को अलग रखकर आज पुलिस बर्बरता की घटना को गंभीरता से लेने की जरूरत हैं. उसी तरह सिखलीगर समाज और समुदाय के नेताओं से भी प्रार्थना है की इस विषय को संजीदगी से ले. गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के चुनाव से प्रभावित होकर कोई काम न करें. सबसे पहला काम तो बेघर हुए सिखलीगर परिवारों को सरकारी आवास बनवाकर दिलाने का हैं. सामूहिक रूप से ये प्रयास सभी को करना होगा. 
--------

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

गुरुद्वारा तखत सचखंड मंडल (बोर्ड) के प्रधान 
तारा सिंह ने मुख्यमंत्री को आखिर प्रधानगी का त्यागपत्र सौंपा 
------
(तारा सिंह विधायक मुलुंड मुंबई)

रविंदर सिंघ मोदी 
तखत सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब मंडल (बोर्ड) के सरकार नियुक्त प्रधान विधायक तारा सिंह को आखिर अपने प्रधानगी का त्यागपत्र मुख्यमंत्री को सौंपना पड़ा. या यह कहिए मुख्यमंत्री के मांगने पर त्यागपत्र देने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं था. इस त्यागपत्र मामले की दो प्रमुख वजह सामने आ रही हैं. 
एक तो आगामी दिसम्बर माह में गुरुद्वारा मंडल के तीन सदस्य पदों के चुनाव होने का पूर्ण अनुमान है. चुनाव मतदाता सूचियों के निर्माण की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है. चुनाव करवाने के लिए एक्ट १९५६ के तहत बोर्ड बर्खास्त करना अनिवार्य है. बोर्ड बर्खास्त करने के लिए प्रधान और वर्तमान सदस्यों को जिम्मेदारी से मुक्त करना भी आवश्यक हो जाता हैं. 
दूसरी वजह ये है कि विगत तीन साल सात माह और कुछ दिनों के कार्यकाल में तारासिंह खासे विवादित रहे हैं. उनके द्वारा गुरुद्वारा बोर्ड और विधानसभा के कार्यकाल में कोई अंतर नहीं किया गया. एक धार्मिक संस्था की गरिमा को राजनीतिकस्तर प्रदान किया. गुरुद्वारा बोर्ड के कार्यकाल में सर्वाधिक विरोध का सामना करनेवाले वे अग्रणी प्रधान है. उनके ख़िलाफ़ कई आरोप लगे. जिनमें अफरातफरी और धांधलियों के आरोप भी शामिल है. अपने निकटवर्तीय रिश्तेदारों को डायरेक्टर नियक्त कर ६० हजार रुपए वेतन (मानधन) देने का विषय हो, कर्मचारी नियुक्ति और प्रमोशन में अनियमितता का विषय हो अथवा टेंडर प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी हो. या फिर दखनी साधसंगत के विरोध का विषय हो. सबकुछ तारासिंह के विपरीत दिखाई देते हैं. तारासिंह द्वारा गुरुद्वारा बोर्ड में कांग्रेस  स्थानीय पदाधिकारियों और मेम्बरों की ताल में ताल मिलाने के कारण भी मुख्यमंत्री खासे नाराज होने की बात सामने आ रही हैं. स्थानीय भाजपाई इस बात को लेकर परेशान थे कि तारासिंह ने कोंग्रेसियों के हाथ में स्थानीय व्यवस्थाएं सौप दी है. यहाँ तक कि गुरुद्वारा बोर्ड के सदस्यों  भी बोर्ड के कामकाज से दूर कर दिया था. इस विषय में बहुत सी शिकायतें मुंबई पहुँच रही थीं. साथ ही एक अहम् विषय यह भी रहा कि, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस तारीख ३१ दिसम्बर २०१७ के दिन गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजुरसाहिब में संपन्न हुए एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए थे. उस समय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अपने भाषण में गुरुद्वारा बोर्ड पर स्थित सरकारी कर्ज की ६२ करोड़ की राशि माफ़ करने का आश्वासन दिया था. विगत दस माह में इस आश्वासन की पूर्ति नहीं हो पायी. हाल ही में यह विषय दैनिक सकाल (सकाळ) समाचार पत्र में प्रकाशित भी हुआ था. इस विषय में भी तारासिंह को जिम्मेदार माना जा रहा है की उन्होंने इस विषय की तकनीकी पहलुओं को सरकार के सामने उजागर नहीं किया.  तारा सिंह का त्यागपत्र एक तरह से सही समय पर आया है. गुरुद्वारा के चुनाव निष्पक्ष हो इस बात के लिए बोर्ड का बर्खास्त होना जरुरी हो गया है. कुछ लोगों ने गुरुद्वारा बोर्ड के सम्भाव्य चुनाव के लिए गुरुद्वारा बोर्ड कार्यालय का जबरदस्त इस्तेमाल शुरू कर दिया था. तारासिंह के त्यागपत्र के बाद गुरुद्वारा प्रशासन अनुशासन से कार्य करने लगेगा ऐसे कयास लगाएं जा रहे हैं. 
---------
अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजिये. 

शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

: ताजा समाचार : 
नरेंद्र मोदी है भगवान विष्णु का ग्यारहवां अवतार’
---
महाराष्ट्र के एक भाजपा प्रवक्ता अवधूत वाघ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान विष्णु का ‘ग्यारहवां अवतार’ बताया है. उन्होंने एक ट्वीट किया, ‘सम्मानीय प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी भगवान विष्णु का ग्यारहवां अवतार हैं.’ बाद में एक मराठी चैनल के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, ‘देश का सौभाग्य है कि हमें मोदी में भगवान जैसा नेता मिला है.’ वाघ के इस बयान के बाद महाराष्ट्र में राजनीतिक गलियारों से अलग-अलग बयान जारी हो रहे हैं. श्री मोदी को देवताओं की कतार में खड़ा कर देने से देशभर में यह विषय सियासी चर्चा का मुद्दा बना रहा. 


वाघ के वक्तव्य पर प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता अतुल लोंधे ने कहा कि यह देवताओं का ‘अपमान’ है. उन्होंने कहा, ‘यह वाघ द्वारा खोई हुई राजनीतिक जमीन हासिल करने की कोशिश भी है. मुझे नहीं लगता कि इस टिप्पणी को ज्यादा महत्व देने की जरुरत है.’ लोंधे ने कहा कि यह टिप्पणी सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के अंदर ‘संस्कृति के निम्नस्तर’ की झलक है. विपक्ष में यह विषय छाया हुआ है. 

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने कहा, ‘वाघ वीजेटीआई से अभियांत्रिकी स्नातक हैं. अब इस बात की जांच करने की जरुरत है कि उनका सर्टिफिकेट असली है या नहीं.’

------------

बेअदबी घटनाओं को लेकर 

AAP विधायक फुल्का ने दिया इस्तीफा

पंजाब में बीते कुछ समय से चल रहे धार्मिक बेअदबी मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के विधायक एचएस फुल्‍का ने शुक्रवार को पंजाब विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. फुल्का ने बेदअबी की घटनाओं में पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और सेवानिवृत्त डीजीपी सुमेध सिंह सैनी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने में राज्य सरकार की कथित 'नाकामी' पर नाराजगी जताते हुए इस्तीफा दिया है. फुल्का ने पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा, 'मैंने पंजाब विधानसभा के विधायक के पद से अपना इस्तीफा विधानसभाध्यक्ष को ई-मेल से भेज दिया है.' विधानसभा अधिकारियों ने बताया कि विधानसभा अध्यक्ष राणा केपी सिंह ने अभी इस्तीफे पर कोई फैसला नहीं किया है. पंजाब में बेअदबी की घटनाओं को लेकर राजनीतिक घमासान मचा हैं. 
-------------

हिंदी और संस्कृत का प्रचार प्रसार :-
अमेरिका सरकार द्वारा अमरीका में हिन्दी और संस्कृत भाषाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विविध कदम उठाएं हैं. जिसके अंतर्गत वाशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने जल्द ही दोनों भाषाओं के लिए नि:शुल्क साप्ताहिक कक्षाएं शुरू करने की घोषणा की है. दूतावास ने एक बयान में कहा है कि कक्षाएं एक घंटे की होंगी और दूतावास में भारतीय संस्कृति के शिक्षक डॉक्टर मॉक्स राज ये कक्षाएं लेंगे.

कक्षाएं दूतावास परिसर में चलाई जाएंगी. कक्षाएं शुरू करने की तारीख के बारे में जल्द ही घोषणा की जाएगी. बयान में बताया गया है कि हिन्दी की कक्षा हर मंगलवार को शाम छह बजे से सात बजे के बीच होगी और संस्कृत की कक्षा हर गुरुवार को इसी समय पर होगी.

वहीं भारतीय दूतावास ने अन्य जानकारी देते हुए ट्वीटर पर नोटिस की एक कॉपी भी शेयर की है. इसमें दी जानकारी के अनुसार इच्छुक लोग हिंदी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं की क्लास कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें केवल अपना नाम, टाइटल, पद और क्लास लिखकर डॉ.मॉक्स राज के ई-मेल पर भेजना होगा. 
अमरीका सरकार ने हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार के लिए एक बड़ी राशि का प्रावधान अपने राष्ट्रिय बजट में किया हैं. 
---------
रविंदर सिंह मोदी 
श्री हजूर साहिब, नांदेड़. 

बुधवार, 19 सितंबर 2018

"मनमर्जियां " के बहाने दिमागी विकृति 
सिखों की भावनाओं को आहत करने की साजिश 
रविंदर सिंह मोदी 

फ़िल्म उड़ान , गैंग ऑफ़ वसेपुर और क्वीन जैसी फिल्मों के लिए फ़िल्म फेयर अवार्ड जीतनेवाले फ़िल्म और टी.वी. सीरियलों के निर्माता निर्देशक अनुराग कश्यप कमाल के षडयंत्रकारी व्यक्ति प्रतीत हो रहे हैं. उत्तरप्रदेश के गोरखपुर की इस पैदाइश ने सिख धर्म के नीतिमूल्यों का खुलकर मजाक उड़ाने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी है. सिख धर्म में धूम्रपान वर्जित है यह सभी हिन्दू और अन्य जातियों के लोग भलीभाँति परिचित हैं. लेकिन अनुराग कश्यप ने अपनी नयी फिल्म "मनमर्जियाँ " में एक दस्तार (पगड़ी) पहने हुए व्यक्ति से स्मोकिंग (धूम्रपान) करवाने के कुछ सीन फिल्मों में जानबूझकर डाल दिए हैं. साथ ही सिख परिवार से संबंधित एक लड़की तापसी पन्नू को धूम्रपान करते दिखाना यानी धार्मिक मूल्यों का अवमूल्यन उसकी के सर मढ़ने वाली बात हो गई हैं. जरूर अनुराग कश्यप ने सिख धर्म को साजिश के तहत बदनाम करने और सिख अनुयायियों में फिल्मों का ग्लैमर जगाने का प्रयत्न किया है. ये बात निषेधार्य है.  
निषेध और निषेध :

दिल्ली, अमृतसर, नांदेड़ साथ साथ देश में जगह जगह से सिखों ने फिल्म का विरोध किया. बाद में फिल्म से कुछ दृश्य हटाने के लिए पहल की गई. लेकिन तब तक अनुराग कश्यप की फिल्म ने २० से २२ करोड़ की अच्छी कमाई कर ली थी. फ़िल्म बनाते समाज अनुराग कश्यप के दिमाग में सभी फार्मूलें एक साथ चल रहे थे. भारतीय लड़कियों को विदेशी लड़कियों के तुलना में खड़ा करने की पूर्ण सहूलियत इस फिल्म में परोसी गई है. लड़कियों की आज़ादी हर सीमा लाँघने के पूर्ण अधिकार ये फ़िल्म प्रदान करती है. सोशल मीडिया का कहा तक दुरूपयोग किया जाना चाहिए यह तो उस व्यक्ति का जातिगत स्वतंत्र हो गया है, जो इसका इस्तेमाल कर  रहा हैं. कश्यप ने उन्हें बढ़ावा देने में कहीं कोई कसार नहीं छोड़ी है. कहीं यह संस्कारी को बेशर्म बनाने की कश्यप की राष्ट्रीय साजिश तो नहीं?
आये दिन फिल्मों में सिखों के चरित्र को कमजोर दिखाने प्रयास हो रहे हैं. किसी फिल्म में सिख का चरित्र नामर्द का दिखाया जा रहा हैं, तो किसी फिल्म में उसे जोकर से कम नहीं दिखाया जा रहा हैं. बहुत बार तो सिखों को खलनायक दिखाया जा रहा हैं. बहुत बार नायिका का पत्र सिख का होता है जिसका अफेयर किसी अन्य धर्म के पात्र के साथ दिखाया जाता हैं. टी.वी. पर विज्ञापनों में सरदार के पीछे बैठी उसकी लड़की को सिर मुण्डे लड़के के छेड़ने जैसे दृश्य दिखाएं जा रहे हैं. ऐसा सिख धर्म के साथ ही क्यों किया जा रहा हैं. 
अनुराग कश्यप किस तरह के हिन्दू है?

उल्लेखनीय है मनमर्जियाँ की शूटिंग के दौरान अनुराग कश्यप, अभिषेक बच्चन, तापसी पन्नू और टीम के कुछ सदस्यों ने श्री दरबार साहिब, हरिमंदर साहिब, अमृतसर के दर्शन भी किये थे. उस समय क्या उन्हें सिख धर्म और सिख संस्कृति के दर्शन नहीं हुए थे? क्या उस समय सिख धर्म के नीतिमूल्यों की उन्हें जानकारी नहीं मिली थी. तापसी पन्नू तो एक सिख (पंजाबी) परिवार से है, क्या उसे भी सिख धर्म के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं हैं ? अनुराग कश्यप को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि, वे किस तरह के हिन्दू है ? गोरखपुर में पैदा होकर भी होने न खुद का धर्म ज्ञात है और न किसी और धर्म का सम्मान ही वे करते हैं. हिन्दू धर्म किसी अन्य धर्म का अनादर नहीं कर सकता. अनुराग को पहले हिन्दू धर्म सिखने की जरुरत है. सिखों के चरित्र इस तरह से पेश कर वे सिख धर्म का अप्रत्यक्ष रूप से मजाक उड़ा रहे हैं. 
संसार बोर्ड लापरहवाह क्यों ?
मीडिया में सिखों के साथ आये दिन साजिश जारी हैं. मीडिया और फिल्म जगत ने मनमर्जी चला रखीं हैं सिखों को अपमानित करने की. क्या सिख देश के सेन्सॉर बोर्ड को सिख धर्म के नीति मूल्यों के संबंध कोई जानकारी नहीं. सिखों के बलिदान और उनके साहस के सम्बन्ध में सेन्सॉर बोर्ड को कोई तथ्य ज्ञात नहीं. कितने गैर जिम्मेदाराना लोग सेन्सॉर बोर्ड में बैठे हैं ? क्या सेंसर बोर्ड भी सिखों की उपेक्षा को आसानी से ले रहा हैं ? सिखों की भावनाएं आहत करनेवाली एक वर्ष में दस से पंद्रह फिल्में अथवा टी.वी. सीरियल दिखाएं जा रहे हैं. सेंसर बोर्ड खामोश है. जो हो रहा हैं उसे होने दिया जा रहा हैं. सेंसर बोर्ड पर सबसे पहले धार्मिक भावनाओं का सम्मान नहीं करने या सिखों के बारे में जानबूझकर अप्पतिजनक तथ्यों के प्रचार के आरोप में कानून करवाई होने चाहिए. 

शनिवार, 15 सितंबर 2018

समाज रचनाकार नहीं होने का अफ़सोस !
आज का सिख, योद्धा नहीं बल्कि राजनीतिक गुलाम है 
रविंदर सिंघ मोदी 
मनुष्य को आदिम जीवन से सामाजिक जीवन तक पहुँचने में हजारों साल लग गए. सामाजिक जीवन तक पहुँचने के लिए मनुष्य को कई सभ्यताओं से गुजरना पड़ा, कई संस्कृतियों की अनुपालना करनी पड़ी, तरह-तरह के धर्म और जातियों के नियमों को अपनाना पड़ा. कदम-कदम पर संघर्ष झेलने पड़े. बहुत बार बलिदान देना पड़ा, कई बार आहुतियाँ देनी पड़ी तब जाकर एक सुरक्षित सामाजिक जीवन हमें प्राप्त हुआ. सामाजिक जीवन का भी एक दायरा होता है. उस दायरे में जाति, प्रथा, रस्मों - रिवाज और उत्तरदायित्व असीमित होते हैं. उत्तरदायित्व का वहन कर जो समाज रचना में योगदान देते हैं वे इतिहास में स्थान पाने के भी हक़दार होते हैं. आमतौर पर इतिहास दो तरह का लिखा जाता हैं. एक इतिहास नायक पद प्रदान करता है तो दूसरा खलनायक की उपाधि देता हैं. समाज हित के पक्षधर नायक की श्रेणी में अग्रक्रम में होते हैं. खलनायकों का इतिहास विध्वंसक, लुटेरा, बेईमान और अमानवीय मूल्यों को तक पर रखनेवाले के रूप में लिखा जाता है. यह जरुरी नहीं की नायक और खलनायक ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी. उसके कर्म और दूरदृष्टि उसका स्थान तय करती है. इसीलिए तो बादशाह सिकंदर भी इतिहास रचने के बाद भी खाली हाथ चला गया.
श्री गुरु नानक देवजी ने दौलत, संपत्ति का संग्रह नहीं किया लेकिन उन्होंने अच्छे और पवित्र कर्म करते हुए अपनी इहलोक यात्रा को भी स्वर्ग यात्रा में परिवर्तित कर दिया. आज गुरु नानकदेवजी के श्रद्धालु करोड़ों की संख्या में हैं, लेकिन सिकंदर के भक्त कितने हैं. सिकंदर को लोग केवल बल, छल का प्रतिक और एक बादशाह के रूप में ही जानते हैं. जबकि गुरु नानक देवजी, एक समाज रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं. सिकंदर ने कई देश जीतें और वो शासक बना. लेकिन किसी भी देश में उसका नाम समाज रचनाकार के रूप में नहीं लिया जाता. जबकि गुरु नानक देवजी ने फकीरों के वेश में विश्वभ्रमण कर मानवों के दिलों में स्थान पाया. वे बाबर जैसे बादशाह से भी नहीं डरे. जेल में जाकर चक्की चलाई। निडर होकर बादशाह बाबर को जाबर कहने का साहस किया. गुरु नानक देवजी की निडरता, निस्वार्थ जीवन ही आगे चलकर सिख धर्म की मूल नींव बनी. उनकी निडरता सिक्खी जीवन में सिद्धान्त के रूप में जीवित रही. आगे चलकर जब संत परंपरा के बावजूद भी शस्त्र उठाना पड़ा तब सिख गुरुओं ने उसी निडरता सिद्धांत को सर्वपरि माना.
सिख धर्म की रचना में गुरु नानक देव जी ने एक अभियंता की भूमिका निभाई हैं. गुरु जी ने केवल उपदेश नहीं दिया, केवल वाणी नहीं रची बल्कि समाज को रचने, बसने, फलने और फूलने की पर्याप्त व्यवस्था की. गुरूजी ने गांव और नगर बसाएँ. गुरूजी पानी की व्यवस्था के लिए कुएं खुदवाएं, सरोवरों का निर्माण करवाया. धर्म (समाज) को संचालित करने के लिए खेती में स्वयं परिश्रम किया. धार्मिक शोध, खोज और भक्तों के सेवा के लिए सिखों से दसवंध लेने की प्रथा शुरू की. उसी दसवंध से सिख धामों और गुरुद्वारों का निर्माण हुआ. दसवँध नाम की संकल्पना धार्मिक प्रयोजनों के लिए व्यवस्था का हिस्सा बनीं थी.
कालांतर बाद, दशम पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज तक ये प्रथा अविरत चलती रहीं. उनके बाद भी तीन शताब्दियों से सिखों ने दसवंध की प्रथा जीवित रखीं हुई हैं. गुरु की गोलक में साध संगत की किर्त-कमाई का संग्रहण होता है. ये कमाई केवल धार्मिक कार्यों और सामाजिक उद्देशों की पूर्ति के लिए खर्च होनी चाहिए. लेकिन वर्तमान में दसवंध केवल कमाई का साधन बन गया है. गुरुघर, सेवा नहीं बल्कि सत्ता केंद्र बन गए हैं. गुरुघर को राजनीति के अड्डों के रूप में उपयोग में लाया जा रहा हैं. गुरुघर का नियंत्रण आज सेवक नहीं बल्कि राजनेता कर रहे हैं. जिनके लिए दसवंध केवल उनके ऐशोआराम का साधन हो गया.
पंजाब से लेकर हजूर साहिब नांदेड़ तक और नांदेड़ से लेकर इंग्लैंड, कॅनडा जैसे देशों में भी दशवंध का अधिकतर स्थानों पर दुरुपयोग ही हो रहा हैं. क्योंकि सिक्खी सिद्धांतों को अमल में नहीं लाया जा रहा हैं. हमारे दस गुरुओं ने सिक्खी सिद्धांतों को प्रचारित किया और उनको सिक्खी जीवन का हिस्सा बनाया. आज समाज बिखरा हुआ हैं. सिख गुटगुटों में बिखरें हुए हैं. केवल सर पर पगड़ी धारण कर सिख होने का दिखावा मात्र कर रहे हैं. समाज की भलाई के लिए कोई काम नहीं कर रहा हैं. सभी की सोच केवल ग्राहक (संगत) बढाकर गोलक भरने मात्र तक सिमित रह गई हैं.
आज गुरुघरों के सेवादार बनने की होड़ तो मची हैं लेकिन कोई भी सच्चा सिख बनने को तैयार नहीं है. आज भी सिख धर्म और समाज को एक सशक्त रचनाकार की जरुरत है. जहां - जहां समाज विघटित हैं वहां - वहां समाज रचनाकारों की जरुरत हैं. लेकिन कोई उद्यमी व्यक्ति समाज के लिए उद्योग करने को तैयार नहीं. राजनीति के लिए सिखों का उपयोग करने के लिए सभी तैयार हैं. लेकिन राजनीति से सिख समाज को बृहद बनाने के लिए कोई कुछ करना नहीं चाहता. सिख धर्म का अनुयाई अपने पूर्व समाज रचनाकारों का इतिहास, योगदान भुला चुके हैं. स्वार्थ के आगे सभी नग्न होकर खड़े हैं. सिक्खी सिद्धांतों का चोला कब शरीर से छूट गया किसी को अहसास तक नहीं. वर्तमान में सिख नाम का प्राणि न आपने गुरु घर की रक्षा के लिए सक्षम दिखाई दे रहा है और न उसमें कहीं सिद्धांतों के जीवित होने के लक्षण ही शेष दिखाई दे रहे हैं.
यदि यही हाल रहा तो वर्ष २०५० तक विश्व में सिखों की संख्या घटकर एक करोड़ से भी कम हो जाएगी. जब तक सिक्खी सिद्धांत जीवित रहेंगे तब तक सिक्खी स्वाभिमान खड़ा रहेगा. सिख धर्म (पंथ) को सिक्खी सिद्धांतों से ही चलाया जाना चाहिए ना कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्र सोच से चलाया जाना चाहिए. आज जिनकी सोच से गुरुघरों का सञ्चालन हो रहा हैं उनकी सोच केवल व्यक्तिगत, राजनीतिक और महत्वकांशी है. उस सोच से आज किसी की जेब गर्म रह सकती हैं. गुजरा के लिए भत्ता मिल सकता हैं लेकिन धर्म साबित नहीं रह सकता. जब तक समाज को निष्पक्ष और निस्वार्थ समाज रचनाकार नहीं मिल जाते तब तक सिक्खी खतरें में हैं. हर सिख खतरे में हैं. टक्के-टक्के में बिकनेवाले यदि आज समाज के संचालन का श्रेय लेना चाह रहे है तो यह केवल जुगाड़ की भाषा है. जुगाड़ और तोड़मरोड़ से राजनिति चल सकती है. समाज और गुरु घर नहीं. क्या हर्ज है कि आज सिखों को ज्ञानवान की जगह आदिम कहा जाये. क्या होगा यदि आज के परिवेश में सिखों को योद्धा नहीं बल्कि राजनीतिक गुलाम कहा जाएं? 
--------------------------
(१५ सितंबर की तारीख अभियंता दिवस के रूप में मनाई जाती है. ऐसे समय रचनाकारों की भूमिका और दायित्व के सम्बन्ध में विचार ताजा हो जाना स्वाभाविक सी बात है.)

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

"अटल-विचार" बेबाक थे 
रविंदर सिंह मोदी 

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक साहित्यिक, एक कवी के रूप में मेरे लिए सदैव आदर्श रहें हैं. उनके विचार स्पष्ट और बेबाक थे क्योंकि उनमें नैतिकता अंत तक जीवित थी. राजनीति में 'साम-दाम, दंड-भेद' का प्रयोग उन्होंने दूर ही रखा था. केवल चरित्र, ईमानदारी, नैतिकता और चिंतन के सहारे उन्होंने अपना राजनीतिक व्यक्तित्व खड़ा किया था, जो वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी से बड़ा दिखाई दे रहा हैं. उनकी छवि विराट प्रतीत हो रही है. उनका जीवन एक सदी जैसा लग रहा है. देश के राजनीतिक इतिहास में अटल जी का अध्याय ईमानदारी के सुवर्ण पृष्ठों पर अंकित हो गए हैं. सबसे अच्छी बात तो यह थी कि, वे स्वयं की भी हर गतिविधि का सूक्षम अवलोकन करते थे. हर विषय, हर भूमिका के बाद आत्ममंथन करते थे. अटल जी के जीवन  की सबसे बड़ी उपलब्धि यही कही जा सकती है कि जो लोग राजनीति में रूचि नहीं रखते वें भी उन्हें पसंद करते थे.  अटल जी अपनी दुविधा भी बहुत बेबाक तरीके से प्रस्तुत करते थे. जैसे की उनकी निम्नलिखित पंक्तियाँ:

नकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं 
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

पीठ मे छुरी सा चांद, राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं

गीत नहीं गाता हूं.  



दिल्ली और लखनऊ के राजनीतिक पटल पर काम-काज की जदोजहद के बावजूद उनके द्वारा साहित्य क्षेत्र के लिए समय निकलना बहुत बड़ी बात थी. उनके सामने सफ़ेद कागज़ का एखाद टुकड़ा भी बिखरा होता तो उसे उठाकर वे फाईल में अथवा अपनी जेब में रख लेते थे. बहुत बार उन टुकड़ों पर कुछ अशियार भी लिखकर जेब में रख लेते थे. हर सुबह पेन की स्याही जरूर जाँच लेते थे. 
एक पत्रकार के रूप में उन्होंने कार्य शुरू किया और अपनी लेखनी से उन्होंने विचारों की क्रांति पैदा की. जनसंघ और भाजपा के लिए उन्होंने समस्त भारत का भ्रमण किया. विविध संस्कृतियों का उन्होंने अध्यन किया. देश के किसी क्षेत्र पर उन्होंने कभी अप्रिय शब्द व्यक्त नहीं किये. यहाँ तक कि कश्मीर के विषय में उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा कि उसे पचाया ना जा सकें. पंजाब के आतंकवाद पर भी उन्होंने संभलकर ही बात रखी. निम्न कविता में कश्मीर और पंजाब के प्रति उनका दर्द स्पष्ट हो जाता है. 
 दूध में दरार पड़ गई
खून क्यों सफेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया.
बंट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.

खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है.
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई.

अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता.
बात बनाएं, बिगड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.  

अटल जी जाने के बाद भी उनके विचार सामान्य लोगों को भी प्रेरणा देते रहेंगे. आज राजनीति को हथियार बनाकर 'साम-दाम, दंड-भेद' की राजनीति को अंजाम देने वालों को तो अटल जी की प्रिय भाजपा में रहकर भाजपा का अपमान करने की कोई जरुरत ही नहीं. अटलजी के विचार भाजपा ही नहीं देश को एक रूप करने में बहुत कारगर हैं. वे विचार सदैव अटल अरु बेबाक रहेंगे इसमें कोई संदेह नहीं हैं. ऐसे महामानव को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए अंतकरण: बोझिल महसूस कर रहा हैं. परमात्मा उन्हें दुबारा इसी भारत भूमि पर नवजीवन प्रदान करे।  
 

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

देश के २१ राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट जारी 
हेमकुंड जानेवाले रास्तों पर मौसम की बढ़ाएं बढ़ीं
 उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से लेकर पश्चिम तक बारिश और बाढ़ का कहर देखने को मिल रहा हैं. उत्तराखंड,  हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर में बारिश, भूस्खलन और बदल फटने की लगातार घटनाएं लगातार जारी हैं. जिससे हेमकुंट साहिब की यात्रा में कठिनाइयाँ प्रस्तुत होने का पूर्ण अनुमान हैं. आनेवाले तीन दिनों में भरी बारिश से मुख्य मार्ग भी बंद हो सकते हैं. ऐसी जानकारी प्राप्त हुई हैं. 
मौसम विभाग ने देश आनेवाले तीन दिनों के लिए 21 राज्यों में भारी बारिश होने का अनुमान जताकर का शुक्रवार (ता. १० ऑगस्ट, २०१८) को अलर्ट जारी किया। जिसके तहत उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, झारखंड, बिहार, पश्चिमी बंगाल, सिक्किम, मध्यप्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में अगले तीन दिन भारी बारिश हो सकती है।
हिमाचल में छह दिन  परेशानियों के : हिमाचल में खराब मौसम से काफी दिक्कत हो रही है। गुरुवार सुबह धूप खिली, लेकिन दोपहर बाद राजधानी शिमला समेत कई स्थानों पर बारिश हुई। मौसम विभाग ने 10 अगस्त से 15 अगस्त तक लगातार बारिश का अनुमान जताया है। 12 और 13 अगस्त को भारी बारिश की भी चेतावनी जारी की गई। गुरुवार को सबसे ज्यादा बारिश 33 मिलीमीटर भुंतर में हुई। बारिश के कारण प्रदेश में करीब 160 सड़कों से संपर्क टूट चुका है। एडिशनल डिप्टी कमिश्नर कृष्णलाल शर्मा ने दावा किया है कि 4-5 दिन में सड़कें खोल दी जाएंगी। 
कुल्लू में बादल फटा : बंजार क्षेत्र की तीर्थन घाटी में गुरुवार देर रात करीब डेढ़ बजे अचानक से बादल फटने से नागनी पंचायत के साईरोपा और गहिधार और दाड़ी गांव में भारी नुकसान हुआ। इसमें दो मकान, एक गौशाला बह गई। वहीं, तीन मकानों को भी नुकसान पहुंचने के समाचार हैं. 

केरल में भरी तबाही का मंजर : दक्षिण के केरल राज्य में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से 26 लोगों की मौत होने के समाचार हैं. आपदा प्रबंधन विभाग अधिकारियों के मुताबिक, सबसे ज्यादा इडुक्की जिले में 11 लोगों की जान गई। यहां अब तक 10 हजार लोगों को राहत शिविरों में भेजा जा चुका है। नदियों के उफान पर होने के कारण राज्य के 24 बांध खोल दिए गए। इडुक्की बांध का गेट 26 साल बाद खोला गया। 
रविंदर सिंह मोदी, हजूर साहिब, नांदेड़. 


बुधवार, 8 अगस्त 2018

खतरा अभी टला नहीं 
शीतकालीन अधिवेशन में फिर प्रस्तुत हो सकता है संशोधन विधेयक
प्रस्ताव तारा सिंह के गले की हड्डी बना ! 
 रविंदर सिंघ मोदी 
महाराष्ट्र सरकार द्वारा आगामी दिनों में विधानसभा का शीतकालीन अधिवेशन बुलाया जा रहा हैं. चिंता की बात यह हैं कि शीतकालीन अधिवेशन में नांदेड़ गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर अपचलनगर साहिब मंडल (बोर्ड) एक्ट १९५६ में मंत्रिमंडल बैठक में मंजूर और प्रस्तावित संशोधन प्रस्ताव दुबारा चर्चा और अनुमति के लिए प्रस्तुत हो सकता हैं. क्योंकि महाराष्ट्र सरकार द्वारा आगामी अधिवेशन में उन सभी प्रस्तावों पर चर्चा की जा रही हैं जिन पर किसी कारणवश नागपुर अधिवेशन में चर्चा अथवा निर्णय नहीं किया गया हैं. 
नांदेड़ के सिखों के लिए ये विषय चिंताजनक है कि संशोधन विषय के मूल सूचक और निवेदक भाजपा के विधायक तारा सिंह ने आज तिथि तक प्रस्तुत विधेयक वापिस नहीं लिया हैं. कानूनी तौर पर अभी तक प्रस्ताव वापिस लेने संबंध में विधायक तारा सिंह को चाहिए था कि लिखित रूप से कारण दर्शाकर राजस्व विभाग से प्रस्ताव वापिस ले ले. लेकिन तारा सिंह का टाइमपास शुरू है. ऐसे तैसे तीन सीटों की चुनाव अचार संहिता शुरू हो जाये और नांदेड़ सिख इस विषय में उलझकर रह जाये यह उसकी योजना है. 
संशोधन विषय पर मेरी बहुत से लोगों के साथ चर्चा हुई है और उसमे यह तथ्य सामने आया है कि मंत्री मंडल की मंजूरी के बाद प्रस्ताव पीछे लेने में तांत्रिक रूप से बहुत कठिनाई है. उस पर चर्चा के समय ही बहुमत से निर्णय लिया जाता हैं. तारा सिंह की हिम्मत नहीं हो रही है कि प्रस्ताव कैसे पीछे लिया जाए. 
आदरणीय पंजप्यारे साहिबान के पत्र और हजूरी साध संगत की मांग पर तारा सिंह ने ता. २८ जुलाई, २०१८ की बैठक में मात्र कलम ६ के तहत प्रस्तावित छह मेम्बरों की संख्या बढाने के एक विषय संशोधन रद्द करने का प्रस्ताव पास किया है. लेकिन केवल आठ सदस्यों द्वारा चर्चा कर निर्णय लिया गया उक्त प्रस्ताव का ठराव (मीटिंग निर्णय) सरकार के राजस्व विभाग को नहीं भेजा है. जिससे यह विषय अभी भी अधिवेशन के पटल पर है यह मानकर चलना होगा. 
वैसे भी संशोधन के संबंध में मीटिंग में चर्चा करने और उसपर निर्णय लेने के लिए बोर्ड का दो-तिहाई बहुमत आवश्यक हैं. आठ की संख्या से यह निर्णय सर्वमान्य नहीं माना जा सकता और न कानूनी रूप से उसे स्वीकार किया जा सकता है. संशोधन का विषय यानी नया कानून बनाने का विषय हैं उस पर बोर्ड का बहुमत दो-तिहाई यानी १७ सदस्यों में से १२ सदस्यों का समर्थन जरुरी हैं. साधारण निर्णय के लिए सात के बहुमत का अंक कोरम के लिए योग्य माना जायेगा. 
यह संशोधन प्रस्ताव अब तारा सिंह के गले की हड्डी बन गया है. तारा सिंह परेशान हैं और उसे अब कम से कम १२ सदस्यों की दरकार हैं. और चार सदस्यों को अपनी ओर करने के लिए तारा सिंह की नरम नीति शुरू हो गई है. अब उन मेम्बरों को मालिक - मालिक कहना शुरू कर दिया हैं जिनको पदों से हटाने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी. कुछ सीनियर मेम्बरों से भी तारा सिंह का संपर्क जारी हैं ऐसे समाचार रोज प्राप्त हो रहे हैं. 
तारा सिंह द्वारा प्रयास किया जा रहा हैं की किसी तरह १७ सदस्यों की एक बैठक बुलाकर मीटींग का पूर्ण बहुमत सरकार को दिखाए. बाद में मीटिंग के मिन्ट्स तो लिखने के सभी अधिकार तारा सिंह के पास है ही वह सरकार को मीटिंग का ठराव (निर्णय) अपने अनुकूल बनाकर भेज देगा. कलम ११ का विषय भी वह काबिलियत से छुपा लेगा.  

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

श्री गुरु नानक देव जी को भूल गए इतिहासकार !
पंजाब की बारहवीं की इतिहास पुस्तक में गुरु नानक का जिक्र तक नहीं 

रविंदर सिंह मोदी 
बात पंजाब और सिक्खी की हो और पंथ के सृजनहार, पहले गुरु, श्री गुरु नानक देवजी का जिक्र ना हो, तो सोचिए कि कैसा प्रतीत होता है. गुरूजी, सिक्खी और सिखों का यह तो घोर अपमान हुआ ना ? यह सिख इतिहास के साथ षड़यंत्र हुआ ना ? बस यही कुछ घटित हुआ है पंजाब के शिक्षा क्षेत्र में. 
हाल ही में पंजाब के शिक्षा विभाग द्वारा कक्षा बारहवीं के इतिहास पाठ्यक्रम की एक पुस्तक वितरित की गई जिसमें १५ वीं और १६ वीं शताब्दी के पंजाब का चित्रण लगभग १२ पृष्ठों के लेख के द्वारा किया गया. आपको जानकर हैरानी होगी कि उसमें कहीं भी श्री गुरु नानक देवजी के नाम या कार्यों का उल्लेख तक नहीं किया गया. इस विषय का समाचार जैसे ही बाहर आया वैसे ही सिखों में रोष और चिंता व्याप्त हुई हैं. यह सब ऐसे समय में घटित  है जब सिख जगत श्री गुरु नानक देव जी के ५५० वें प्रकाश पूरब (जनम दिहाड़ा) मनाने की तैयारी में जुटा हुआ हैं. 
बताया जा रहा है कि, इतिहास के इस पाठ्यक्रम में पंजाब की राजसी दशा और इतिहास पर भरपूर जानकारी परोसी गई. सिकंदर लोधी के पंजाब आगमन की कहानी,  बाबर और हुमायूँ के इतिहास की जानकारी दी गईं हैं. जबकि उनके खिलाफ प्रतिकार की पहल करनेवाले गुरु नानक देव जी का जिक्र टाल दिया गया. सिकंदर लोधी से गुरु नानक देवजी की वैचारिक लड़ाई सिख जगत में प्रसिद्ध है. कई इतिहासकारों ने लिखा हैं. गुरु नानक देव जी बाबर की कैद में चक्की चलाते थे. बाबर को जाबर (अत्याचारी) कहकर उन्होंने प्रतिकार  किया था. लेकिन यह सारे ऐतहासिक प्रसंगों को पुस्तक में शामिल नहीं किया गया. यह सबकुछ जानबूझ कर और सोची-समझीं  विचारधारा के तहत घटित हो रहा हैं कहा जाएं तो गलत नहीं होगा. 
महाराष्ट्र के मराठा समाज की सराहना की जानी चाहिए कि उसने छत्रपति शिवाजी महाराज के इतिहास को जीवंत जीवंत ही नहीं रखा बल्कि इतिहास में एक लम्बा संशोधन भी करवाया. राजस्थान में भी वीर महाराणा प्रताप सिंह जी के इतिहास पर व्यापक शोध का कार्य क्षत्रिय राजपूत समाज ने जारी रखा. पंजाब में कुछ लापरवाही हुईं. 
वहां, अधिकतर इतिहास पंजाबी भाषा में और गुरुमुखी लिपि में होने के कारण इतिहास और जानकारी सिमित रह गईं. गुरुमुखी में रचित और छपे बहुत से सन्दर्भ ग्रन्थ, पुस्तकें और दस्तावेज नष्ट हो गए. आपको ज्ञात कराऊँ कि श्री गुरु गोबिंद सिंघजी महाराज जिस समय अपने परिवार और साथियों के साथ सिरसा नदी पार कर रहे थे तब बाढ़ के कारण दो टन वजन का बहुमूल्य सिख साहित्य जिसमें इतिहास खोजी दस्तावेज, पांडुलिपियां आदि पानी में बहकर नष्ट हो गए थे. गुरु जी ने वह साहित्य खोज करवाने और लिखवाने में बीस से पच्चीस वर्षों की मेहनत की थी. 
अब तक हमारे पास जो इतिहास और दस्तावेज सुरक्षित हैं उसके आधार पर सिख पंथ मार्गक्रमण कर रहा हैं. लेकिन युवा पीढ़ी की मानसिकता उस तथ्य को जल्दी स्वीकार करती हैं जो पाठ्यक्रम में लिखित सामग्री हो. ठीक है सिख धर्म में पैदा हुए बच्चों को सिख धर्म हम समझा सकते हैं लेकिन गैर सिख विद्यार्थियों को सिख धर्म समझने और पढ़ने की जरुरत ही महसूस नहीं होती है, वें क्यों जानना चाहेंगे सिख धर्म के सन्दर्भ में. साढ़े पांच सौ वर्षों में सिख धर्म जितना परिचित  चाहिए था, उतना नहीं हुआ. उसके कारणों पर चिंतन जरुरी हैं. लेकिन इस चिंतन के लिए किसी भी सिख के पास समय नहीं है. तब कहां सुरक्षित रह पायेगा आपका इतिहास और आप ?

सोमवार, 6 अगस्त 2018

तारा सिंह का वो गुमराह पत्र और कांग्रेस कनेक्शन !
रविंदर सिंह मोदी 
(फाइल फोटो )
कहावत है कि, बन्दर कितना भी बूढ़ा हो जाए कुलाटी मारना नहीं छोड़ता. शातिर व्यक्ति आँखों की रौशनी चली जाने के बाद भी षड़यंत्र रचने में कोई कसर नहीं छोड़ता उसी तरह राजनीतिक व्यक्ति मृत्युशैय्या पर लेटकर भी अंतिम समय तक राजनीति को अंजाम देने में नहीं चूकता. उसी तरह विधायक तारा सिंह गुमराह करने में कोई कसर नहीं रखता. 
उसकी आँख मटकी तो समझ लेना कि कोई नया तिकड़म लड़ाने की वो कोशिश कर रहा है. अब देखिये ना, जैसे ही उस पर गुरुद्वारा बोर्ड कानून में किये गए जबरन संशोधन रद्द करवाने के विषय में संगत ने चुप्पी साधे बैठने का आरोप लगाया तो नांदेड़ के सोशल मीडिया पर उसका एक पत्र वायरल किया गया. मजे की बात तो यह है कि, भाजपा के आमदार तारा सिंह द्वारा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भेजे गए गुरुद्वारा बोर्ड मीटिंग (ता. २८ जुलाई, २०१८) संपन्न होने की जानकारी देने वाला पत्र व्हाट्सएप्प पर नांदेड़ के कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने वायरल किया. उन्होंने तारा सिंह को बधाई भी दी. तारा सिंह को साथ देनेवाले और बधाई देनेवाले सभी कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री श्री अशोक राव चव्हाण के निकटवर्तीय माने जाते हैं. साथ ही कांग्रेस विधायक डी.पी. सावंत के भी वे दहिने - बाये बताये जाते हैं. 
तारा सिंह द्वारा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भेजे गए पत्र की कॉपी सबसे पहले कांग्रेसियों के पास पहुंची कैसे ? क्या तारा सिंह के अंदरूनी रूप से कांग्रेस से तार जुड़े हुए हैं ? क्या साल २०१९ में राज्य में सत्ता परिवर्तन हो जाए तो तारा सिंह को कांग्रेस पार्टी दुबारा गुरुद्वारा का सीधा अध्यक्ष नियुक्त करनेवाली हैं ? क्या तारा सिंह को नांदेड़ के भाजपाइयों से एलर्जी हैं? या यहाँ के भाजपा कार्यकर्ता तारा सिंह की अवैध कार्यों में रुकावट बनें हुए हैं ? खुलासा होना चाहिए. आज कल गुरुद्वारा के टेंडर विषय पर बहुत चर्चा हो रही हैं. 
उधर शिवसेना के एक बड़े नेता (नाम सभी को पता है ) ने तो पिछले दिनों नागपुर अधिवेशन के समय नांदेड़ के एक शिवसेना पदाधिकारी के साथ बातचीत में यह तक संभावना व्यक्त कर दी कि तारा सिंह शिवसेना के संपर्क में है! 
इस विचित्र नेता तारा सिंह ने मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में सबसे पहले यह सन्देश देने का प्रयास किया हैं कि ''नांदेड़ के सभी सदस्य" बैठक में अनुपस्थित थे. जैसे कि उसने गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर अपचल नगर साहिब मंडल कानून (एक्ट - १९५६) की धारा ६, ७, और १५ में संशोधन करने के प्रस्ताव में लिखा है कि नांदेड़ के मेंबर मेरा कोरम पूरा नहीं होने दे रहे हैं इसलिए मुझे छह मेंबर बढाकर दिए जाएं। अपनी महत्वाकांक्षा भरी बात उसने पत्र में सबसे पहले लिख दी कि, "इस बार भी नांदेड़ के सदस्य मेरी बुलाई मीटिंग में नहीं पहुंचे" इसलिए मेरा संशोधन की मांग का प्रस्ताव एकदम सही है. लेकिन करें क्या ? हमारे पंजप्यारे साहिबान द्वारा और हजूर साहिब संगत द्वारा विरोध किये जाने के बाद सिर्फ १७ सदस्यों का बोर्ड चल जायेगा ऐसी हामी उसे भरनी पड़ी. तारा सिंह और ता. २८ जुलाई, २०१८ की मीटिंग में मेंबर साहिबान ने साध संगत की वो मांग क्यों ठुकरा दी जिसमें सरकार द्वारा "अध्यक्ष की सीधी नियुक्ति" करनेवाली धारा (कलम) ११ का वर्ष २०१५ में किया गया संशोधन रद्द करने की स्पष्ट मांग की गई थी. 
आदरणीय पंजप्यारे साहिबान का पत्र भी ठीक से पढ़ लेना चाहिए था. मीटिंग में सभी पढ़े-लिखे और दिग्गज मेंबर साहिबान थे. पत्र में क्या मांग है उस विषय में क्या पत्र व्यवहार किया गया, भाषा की चालखी आदि को लेकर तारा सिंह साध संगत से खुली चर्चा करे ऐसी हमारी मांग हैं. तारा सिंह की यह चालाखी विधानसभा में चल जाएगी लेकिन संगत की सभा में नहीं चलेगी ये ध्यान रखना. 
चलो आज तारा सिंह की महत्वाकांक्षा में बहुत से लोगों की भी ख्वाइशें जुडी हुई हैं इसलिए उसके खिलाफ आंदोलन करनेवालों को टारगेट किया जा रहा हैं. आंदोलन में सक्रीय बहुत से लोगों को विधायक तारा सिंह से सीधा खतरा हैं. वो साम दाम दंड भेद के अमल में माहिर है. उसके कुछ कट्टर समर्थक जिन पर तारा सिंह की रहमोकरम ज्यादा हैं वो आंदोलन शामिल कुछ नेताओं को बुरी निय्यत से देख रहे हैं. 
आनेवाले दिनों में गुरुद्वारा मंडल के तीन सीटों के चुनाव भी होने वाले हैं. नांदेड़ का वातावरण ये तारा सिंह और उसके समर्थक बिगाड़ सकते हैं, इसलिए तारा सिंह को बोर्ड के अध्यक्ष पद से तुरंत बर्खास्त करना ही सबसे योग्य रहेगा. उसके द्वारा गुरुद्वारा बोर्ड की सत्ता का दूरोपयोग करने की पूर्ण सम्भावना है. तारा सिंह के नजदीक के लोग तो बात बात पर तलवार से हमला कर देते हैं. हजूर साहिब के दो लोग तलवार हमले में बुरी तरह से घायल हुए हैं. ऐसी बिगड़ी परिस्थिति में तारा सिंह को तुरंत हटाना बेहद जरुरी हो गया है. नांदेड़  भारतीय जनता पार्टी के सभी स्थानीय नेता और पदाधिकारी भी इन घटनाओं से चिंतित हैं. उन्हें यहाँ की असलियत आलाकमान को तुरंत बतानी चाहिए. साथ ही इस भोले-भाले, नटखट और उत्पाती नेता की कांग्रेस के जाल में मारी गई ने कुलाटी का भी जिक्र विस्तार से करना चाहिए. तारा सिंह के इस कनेक्शन के कारण सिख मतदाता सम्भ्रमित हैं. इस बात का चिंतन भाजपा  करेगी ऐसी उम्मीद है.  

शनिवार, 4 अगस्त 2018

तारासिंह की प्रधानगी तखत साहब के लिए अभिशाप जैसी !
रविंदर सिंह मोदी 
(फ़ाइल फोटो )
एक व्यक्ति सिर पर दस्तार बांधता है. अपने नाम में अमृतपान में मिली उपाधि "सिंह" अथवा "सिंघ" का उपयोग करता हैं. गुरुद्वारा में जाकर मत्था भी टेकता है. एक अमृतधारी सिख की तरह बाहर समाज में आचरण भी करता है. लेकिन उसके दिल में ना सिख गुरु और ना सिक्खी तत्वों के प्रति आस्था रहती है और ना ही वह गुरु घर को नुकसान पहुँचाने में कोई कसर छोड़ता है. ऐसे व्यक्ति को क्या किसी तखत जैसे गरिमामय स्थान का प्रधान होना चाहिए ? 
जो व्यक्ति गुरु घर को बचाने के लिए (सरकार द्वारा किये गए संशोधन के प्रस्ताव का सूत्रधार बनता है और संगत की मांग के बावजूद भी सरकार के मुखिया मुख्यमंत्री के पास संशोधन रद्द करवाने के विषय में) आवाज नहीं उठता हो क्या ऐसे डरपोक और षडयंत्रकारी व्यक्ति को तखत जैसे स्थान पर प्रधान होना चाहिए ? 
जिस व्यक्ति ने जमीनों के वितरण में पक्षपात किया हो, जिसने अपने रिश्तेदारों को वेतन देने के लिए गुरु घर की गोलक खर्च की, जिसने योग्यता प्राप्त और हक़दार कर्मचारियों ना प्रमोशन दिया न ग्रेड दिया हो, जिसने ३५० बेरोजगार युवकों को डेलीवेजस पर नियुक्ति नहीं देकर फिक्स पे अथवा एग्रीमेंट टाइप के अप्पॉइंमेंट देकर उनके भविष्य से खिलवाड़ शुरू की हैं क्या उसे प्रधान बना रहना चाहिए ?
जिस व्यक्ति ने नांदेड़ के स्थानीय गुरुद्वारा बोर्ड मेम्बरों को हमेशा गुटों में बांटने की नीति अपनाकर अपना सिक्का चलाया. तखत की मर्यादा के ख़िलाफ कुछ मेम्बरों को वर्ष २०१५ में तखत साहब पर मत्था टीकाकार गुरु महाराज की और श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी की शपथ "कसम" खाने के लिए मजबूर किया. क्या उसे प्रधान पद पर रहने का अधिकार है?
तारा सिंह जैसे व्यक्ति को तखत सचखंड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा नांदेड़  का प्रधान बनाकर भारतीय जनता पार्टी ने पता नहीं क्या साध लिया. लेकिन हजूर साहिब के लोगों ने इस थापे गए व्यक्ति की प्रधानगी से सिर्फ अभिशाप और अभिशाप ही पाया है ऐसा में दावे के साथ कह सकता हूँ. देवेंद्र फडणवीस जैसे युवा नेतृत्व से गहरी चूक हो गई या मान लो कि लापरवाही में या अतिविश्वास में एक "पाप" हो गया. श्री गुरु गोबिंद सिंघजी महाराज के इस पावन स्थल पर कभी हैदराबाद रियासत के राजा, औरंगजेब का लड़का बहादुरशाह या निज़ाम ने भी कोई वास्तु लेकर जाने की नियत नहीं रखीं वहां ये तारा सिंह गुरुघर का सरकारीकरण करने पर तुला हुआ है. 
देश में बहुत से धार्मिक स्थलों का सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया गया हैं. महाराष्ट्र सरकार के निशाने पर नांदेड़ का गुरुद्वारा है. जब किसी ने भी जब मांग नहीं की तो संशोधन किसलिए ? तीन सालों  बार संशोधन? कल कोई और सिरफिरा सरकार से सीधा नियुक्त होकर आएगा और किसी ऐतहासिक गुरुद्वारा को किसी संत कोई देने या बोली लगाकर आवंटित करने की कोशिश करेगा तो क्या तब भी सरकार उसका साथ देगी और लोग खामोश तमाशा देखेंगे ? जो इस परिस्थिति में पूरी तरह से तारासिंह की नीतियों को शरणागत हो गए है वे लोग क्या कदम उठाएंगे ? कुछ नवजवानों को एक्ट संशोधन का ठीक से समझ नहीं आ रहा हैं, वे उतना ही समझ रहे हैं जितना उनके करीबी नेतागण उन्हें समझा रहे हैं. जिन्हें एक्ट संशोधन के संघर्ष में नहीं पड़ना है उन्हें गुरुद्वारा बोर्ड के चुनावों में रस क्यों हैं ? क्या सरकारी नियुक्त प्रधान की गुलामी करने के लिए ? या महज अपने ही समाज के कुछ व्यक्ति से बदला निकालने के लिए?  किसलिए यह सब किया जा रहा हैं ?  
आज एक्ट संशोधन को लेकर सिख समाज के लोग बँट गए हैं. एक दूसरे को दुश्मन की निगाह से देख रहे हैं. एक दूसरे की आलोचना कर रहे हैं. यहाँ तारा सिंह के राज में मारपीट, हमले और पुलिस करवाई जैसी बातों से समाज में विचलन हो रहा है. यह सब क्या किसी अभिशाप कम है ? सरकार का भेजा राजनीतिक नेता यहाँ सत्ता भोग रहा है और यहाँ के वतनदार निवासी अभिशाप की छाया में रहें ? देवेंद्र फडणवीस जी नांदेड़ की वतनदार सिखों ऐसी मानसिकता के आपका निर्णय कारणीभूत ही नहीं बल्कि एक अभिशाप प्रतीत हो रहा है. कुछ कीजिये ! या फिर जलियावालां की तर्ज पर नांदेड़ के वतनदार सिखों पर सीधा ऑपरेशन कर दीजिये. आप और तारा सिंह शासक है. सरकार है, आपको सबकुछ माफ़ हो जायेगा.   

  होली हल्ला महल्ला यात्रा मार्ग की दुरुस्ती करें : मनबीरसिंघ ग्रंथी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार समूह) के युथ प्रदेश सचिव स. मनबीर...