हजूरी प्रधान कैसे ?
फिर प्रधान बनने के लिए तारासिंह की तडजोड़ शुरू
बोर्ड पर स्थापित होगा मुम्बईया राज?
-------
रविन्दरसिंघ मोदी
जब तक मुख्यमंत्री श्रीमान देवेंद्र फडणवीस जी का आँख बँधकर समर्थन कायम है तब तक भाजपा के विधायक और गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड नांदेड़ के सरकारी प्रधान तारा सिंह का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता यह तो स्पष्ट हो चला है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उनकी हर गलती, नादानी, मनमानी, अफरा-तफरी और साजिश को नजर अंदाज कर रहे हैं. गुरुद्वारा सचखंड के प्रबंधन में उन्हें जी.पी.सी. के मेंबर उनके हुकुम के आगे नतमस्तक दिखाई दे रहे है.
इस कुशल हुकुमरान ने हजूर साहिब में नौकरियां बांटकर सब सिखों की जुबानें सील दी हैं. प्रमोशन तो मिठाई जैसी बाँट कर उन्होंने नियमों को तक पर रख दिया. उनके खिलाफ कितनी भी शिकायतें कर लीजिये उनको पद से कोई नहीं हटा सकता। भाजपा के इस विधायक के पीछे सरकार खड़ी हो जाने से उसकी मनमानी इतनी बढ़ गई कि गुरु घर के प्रबंधन में सैकड़ों गलतियाँ कर दी. नुकसान कर दिया. गोलक पर खर्च लाद दिया और सच्चा सुच्चा बनने का नाटक करना शुरू कर दिया. भाजपा के ईमानदार सरकार द्वारा लादे हुए इस प्रधान ने गुरुघर के प्रबंधन को उसने किसी निजी ट्रस्ट की सत्ता जैसा हाँकना शुरू कर दिया. आज भी हाँक रहा हैं. शायद उसे मरने तक भी यहाँ का प्रधान बना रहना है. अब तो उसके साथ इस.जी.पी.सी. की मुंबई की हस्तियाँ और दशम की विरोधी भी कंधे से कन्धा लगाकर काम कर रहे हैं. सभी की यही इच्छा है कि हजूर साहिब में हजूरी प्रधान नहीं बनना चाहिए.
अब तो औरंगाबाद में भी यही बात फैलाई जा रही हैं की यहाँ हजूरी प्रधान ठीक नहीं हैं. इसलिए मुंबई वालों की सत्ता हजूर साहिब में स्थापित होनी चाहिए. बहुत सी शक्तियाँ इस काम में जुट गई हैं कि हजूरी प्रधान ना बन पाएं और कलम ग्यारह (११) सरकार के अधीन रखकर ही हजूर साहिब बोर्ड का प्रशासन चलाया जाना चाहिए. और यह काम तारा सिंह के लिए कोई कठिन नहीं हैं. मुंबई से औरंगाबाद और वहाँ से हजुरसाहिब तक उसने अपना नेटवर्क मजबूत कर लिया हैं. अपना नेटवर्क मजबूत करने के लिए उनसे भाजपा को पहले दूर कर दिया. उसने कांग्रेस के कुछ मोहरों को मैदान में उतारा. कुछ पढ़े लिखों को पदों का लालच देकर अपने साथ कर लिया. दीवान ख़त्म करने की धमकियां देकर एक गुट को खामोश कर दिया तो दूसरें को उत्साहित कर दिया.
अब गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव में वो अपने तीन मेंबर चुनकर लाने के प्रयास में हैं. उसकी नीति और राजनीति हजुरसाहिब की संगत के आगे कामयाब लग रही हैं. हो सकता हैं कि चुनाव के बाद तारासिंह अपने साथ मुंबई के दो से तीन मेंबर बोर्ड में लेकर आ जाएँ. पिछली बार जिनकों सरकार द्वारा मनोनीत कर दिया गया था शायद उनके स्थान पर मुंबई और नागपुर से कोई मेंबर बनकर आये. और हजूर साहिब के स्वाभिमानी सिख उन्हें "साहब" "साहब" कहकर सिरमात्थे लगा ले.
स्मरण होगा कि अपने इसी राजनीतिक बल और राजनीतिक पहुँच के कारण ही तारासिंह ने गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कानून १९५६ (कलम ११) में जबरन संशोधन करवाकर गुरु घर का सरकारीकरण करवा दिया था और हम कुछ नहीं कर पाए थे. बाहुबली तारासिंह सिंह यही तक नहीं रुके उन्होंने तो बाद में प्रधान का कोरम मुंबई में बैठे बैठे प्राप्त करने के लिए गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट १९५६ में कलम ६ में भी संशोधन करवा दिया. यह संशोधन पीछे लेने के लिए उसके खिलाफ आंदोलन किया गया. पर उसने कुशलता से उसे दबा दिया. इस आंदोलन को निरस्त करने करने के लिए उसने साम दाम दंड भेद का सहारा लिया. यहाँ तक कि संतों की अपील पर भी उसने संशोधन पीछे नहीं लिया. क्योंकि उसे अपनी राजनीतिक ताकत केवल गुरुघर के खिलाफ ही उपयोग में लाना था. इस पगड़ीधारी विधायक ने अपनी राजनीतीक साख गुरु घर के सरकारी कारण करने में खर्च कर दी. अब बोर्ड की चाब्बीयां भी सरकार को सौंपने की उसकी तैयारी दिखाई दे रही हैं.
औरंगाबाद से खेल शुरू !!
(औरंगाबाद में २० दिसंबर को कलम ग्यारह के समर्थक मुंबई के मेंबर चुनाव प्रचार करते हुए.)
औरंगाबाद में उसने गुरुवार ता. २० दिसंबर को गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव का प्रचार किया लेकिन भाजपा के लिए नहीं. उसने स्पष्ट कहा हैं कि नांदेड़ के एक उम्मीदवार को वोट दे बाकी दो यही के उम्मीदवारों को वोट दे. यानी वो नांदेड़ और औरंगाबाद के मतदाताओं में सीधी फूट डालना चाह रहा हैं. उसके साथ प्रचार में इस.जी.पी.सी. के मेंबर भी थे, मीत प्रधान भूपिंदर सिंह मिन्हास और गुरविंदर सिंह बावा,. इकबाल सिंह, सुरजीत सिंह भी प्रचार बैठक में शामिल थे. विधायक तारा सिंह की ऐसी नीतियाँ हैं तो हजुरसाहिब के सिखों को भी सोचना चाहिए कि उनका भविष्य क्या होगा? तारा सिंह को निष्पक्ष रहना चाहिए थे या भाजपा के उम्मीदवार खड़े करने चाहिए थे. मुख्यमंत्री जी तारा सिंह से और क्या करवाना चाहते हैं आप? वर्ष २०१५ से आपने हमारा बोर्ड अधिग्रहित कर लिया हैं. अब बोर्ड बर्खास्त करना था लेकिन नहीं किया. तारासिंह का इस्तीफा क्यों लिया गया? सरकार का बल लेकर वो अब नान्देड़ के सिखों के साथ खेल खेल रहा हैं. आपस में एक दूसरों को लड़ा रहा हैं. ऐसे में हजूरी प्रधान कैसे बनेगा?
(विधायक तारा सिंह औरंगाबाद में चनाव प्रचार में अपना सिक्का जमाते हुए. )
इस चुनाव में भी विधायक तारासिंह सभी को चॉकलेट दे रहा हैं. जिनका प्रचार कर रहा है उन्हें भी बेवकूफ बना रहा हैं. वो किसी भी हाल में हजूरी प्रधान बनने नहीं देगा. चुनकर आनेवाले मेंबर उसकी गोद में बैठकर राजनीति नहीं करेंगे, इसकी क्या गारंटी? चाहे कोई भी स्थानीय व्यत्कि मेंबर बनें, कोई भी हजूर साहिब निवासी का निवासी प्रधान बनें हमे आपत्ति नहीं. ना विरोध होगा. सभी को अधिकार है वो प्रधान बनें , मेंबर बनें. लेकिन गुरुघर के, तारासिंह के नहीं. इसलिए जो लोग तारासिंह का सहारा ले रहे हैं उन्हें उसकी कोई जरुरत ही नहीं हैं. अपनी काबिलियत पर चुनकर आये हम स्वागत करेंगे. आपका काम आपको सफलता देगा. लेकिन यदि आप तारा सिंह के लिए चुनकर आना चाहते हैं तो आपकी राजनीतिक कुशलता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाता हैं. हजूर साहिब की भोली भली संगत का भविष्य दाँव पर लगाना किसी हाल में भी उचित नहीं होगा. तारा सिंह ने गुरुघर का सरकारीकरण कर पाप ही किया हैं उसके पाप में हजूर साहिब का कोई भी भागीदार ना बनें यही प्रार्थना हैं.
(आपकी प्रतिक्रिया जरूर दें..... और इस पोस्ट को आगे शेयर करें. ....)



















