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शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

संतों को आश्वासन देकर मुकर गए गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान!

लेटर तैयार हैं तो देते क्यों नहीं?

स. रविंदरसिंघ मोदी 

(तारीख 18 जनवरी, 2022 के दिन कर्मचारियों के शिष्ट को संतबाबा कुलवंतसिंघ जी और संतबाबा बलविंदरसिंघ जी कारसेवा प्रधान साहब से हुईं बातचित का संदेश प्रेषित करते हुए. - स. रविंदरसिंघ मोदी)

तारीखें बहुत बार, खुद गवाह बन जाती हैं. आनेवाले समय में यही तारीखें गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के प्रधान स. भूपिंदरसिंघ मिनहास से जवाब मांगेंगी. डेलीवेजस कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने के विषय में बोर्ड के प्रधान मिनहास द्वारा तखत साहब के जत्थेदार साहिब संतबाबा कुलवंतसिंघजी और श्री लंगर साहिब के मुखी संतबाबा बलविंदरसिंघ जी कारसेवावाले द्वारा डेलीवेजस कर्मचारियों को सेवा में कायम करने संबंध में किये गए संयुक्त आग्रह को एक तरीके से ठुकरा दिया गया हैं. बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होने में अब एक महीने से भी कम समय रह गया हैं. अब ना 'बोर्ड मीटिंग' होने की कोई संभावना बन रहीं और ना ही "मिनहास बोर्ड" का कार्यकाल बढ़ने की ही कोई गुंजाईश दिखाई दें रहीं हैं. कहा जा रहा है कि रिकविजिशन फंडा भी नाकाम हुआ है. जिसका अर्थ यही हुआ कि गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान स. भूपिंदरसिंघ मिनहास अपनी कूटनीति में पूरी तरह सफल रहे है. संतों के साथ वायदाखिलाफ़ी कर कर्मचारियों की मांगों को हाशिये पर रखने की उनकी "योजना" सफल हो गईं. काश! राजनीतिक सोच त्यागकर इन डेलीवेजस और बील मुक्ता कर्मचारियों की परेशानियां, उनकी समस्याएं ये "सरकारी प्रधान", मीत प्रधान, बोर्ड के सेक्रेटरी और मेंबर साहिबान समझ पाते ! इन कर्मचारियों के परिवार के दुःखों और उनकी आर्थिक परेशानियों को वें ठीक से समझ पाते. केवल सत्ता के दांवपेच, कोर्ट - कचहरी और आपसी झगड़ों में तीन साल व्यर्थ करने वाले इस वीआईपी कल्चर के "मिनहास बोर्ड" का इतिहास किस स्याही से लिखा जाए यह यह प्रश्न उपस्थित हो रहा हैं. लेकिन मिनहास साहब और उनका बोर्ड सनद रखें कि तारीखें अपना काम कर गईं हैं. आप सभी को साबित कर गईं हैं ! 

(फाइल फोटो 18 -01-2022)

वाकिया आज से ठीक एक महीना पहले, तारीख 18 जनवरी 2022 का है. इस तारीख को डेलीवेजस कर्मचारी भाई - बहन एक शिष्टमंडल के रूप में अपनी फरियाद और मुराद लेकर संतबाबा कुलवंतसिंघ जी और संतबाबा बलविंदरसिंघजी के पास पहुँचे थे कि वें गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान स. भूपिंदरसिंघ मिनहास से दरखास्त करें कि उन्हें (कर्मचारियों) सेवा में कायम किया जाए. कर्मचारियों की प्रार्थना पर जत्थेदार साहब और संतबाबा बलविंदरसिंघजी कारसेवा वाले ने उदार मन से "प्रस्तुत विषय" पर गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के प्रधान स. भूपिंदरसिंघ मिनहास को फोन लगाकर कर्मचारियों की मांगों के संबंध में विस्तार से चर्चा की थीं. जिसके जवाब में श्री मिनहास ने दोनों संतों को फोन पर आश्वासन दिया था कि फ़रवरी 2022 के पहले सप्ताह में "वें" स्वयं नांदेड़ पहुंचकर डेलीवेजस कर्मचारियों की यह मांग पूर्ण करेंगे. बातचीत के बाद मानयोग जत्थेदार जी और संतबाबा कुलवंतसिंघजी द्वारा कर्मचारियों के शिष्टमंडल को यह जानकारी सुनाई गईं. जिसके बाद कर्मचारी भाई - बहन खुश होकर घर लौटें थे. संतबाबा बलविंदरसिंघजी ने भी ख़ुश होकर सभी आशावान कर्मचारियों को आशीषें दीं कि सेवा में पक्का होने का कार्य जल्द जल्द पूर्ण हो जाए.  

(फाइल फोटो 18-01-2022)

फरवरी 2022 का वह 'पहला सप्ताह' गुजर गया! लेकिन प्रधान साहब (मिनहास साहब) ने नांदेड़ का रुख नहीं किया. 5 फरवरी, 6 फरवरी और 7 फरवरी की तारीखें एक के बाद एक कर बीत गईं. दौरा टल गया या टाला गया यह चर्चा चल पड़ी. स्वाभाविक हैं कि कर्मचारियों को खुशियों की सौगात लेकर आने वाले प्रधान साहब का दौरा टल जाने से सभी आशावान कर्मचारियों में बेचैनी बढ़ गईं. बीच - बीच में यह भी चर्चा सुनाई पड़ रहीं थीं कि "साहब" इस बात से ही नाराज हो गए कि कर्मचारियों का शिष्टमंडल यह मांगें लेकर जत्थेदार साहब और संतबाबा बलविंदरसिंघजी के पास प्रस्तुत क्यों हुआ? वर्तमान बोर्ड के कुछ मेंबर साहब भी यहीं सोच रहे थे कि यह निर्णय बोर्ड के प्रधान और मेंबर साहब के अधीन हैं और इसमें बाबाजी कर क्या सकते हैं? उनकी यह सोच भी सही हैं. लेकिन जिस बोर्ड का प्रधान (कार्य प्रमुख) साल भर नांदेड़ नहीं पहुंचता हो और ना संस्था के कर्मचारियों की सुध ही लेता हो, जो हजूरसाहब के लोगों के फोन भी स्वीकार नहीं करता हो, उन महाशय से संपर्क करें तो कैसे? बोर्ड का मीत प्रधान दो साल से अधिक समय नांदेड़ नहीं आया हैं फिर किसी से क्या आस रखीं जाए? चर्चा हैं, प्रधान साहब और मीत प्रधान साहब के नुमाइंदे के रूप में बोर्ड में कार्यरत सेक्रेटरी साहब यह दावा करते हैं कि कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने के लिए उनके पास "लेटर" बनकर तैयार हैं. यदि ऐसा है तो पता नहीं किस मुहूर्त का इंतजार किया जा रहा हैं? 

पहली बात तो यह हैं कि तीन सालों से जो लोग कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने के लिए झांसें दिए जा रहे हैं, उनके प्रति क्या कर्मचारियों को नाराज होने का भी स्वातंत्र्य नहीं हैं? क्या यह लोग गुलामों की श्रेणी में आते हैं कि उन्हें अपने अधिकार और हक के मामले में आवाज़ उठाने की आजादी नहीं हैं. बोर्ड कर्मचारियों में एक मनोवैज्ञानिक डर व्याप्त हैं कि कहीं उन्हें सेवा से निलंबित तो नहीं कर दिया जाएगा? कहीं उन्हें सेवा से बर्खास्त तो नहीं कर दिया जायेगा? इस तरह का असुरक्षित माहौल इस संस्था में पैदा कैसे हो गया? तबादलों की राजनीति क्यों अक्सर चर्चाओं में रहती हैं !

सत्ता में बैठें मूकदर्शक "साहब" लोगों से हमारा सीधा सवाल है कि वें बताएं कि इन बेबस कर्मचारियों को अपनी मांगें लेकर किसके पास जाना चाहिए था? उन्हें क्या कदम उठाना चाहिए था? क्या कर्मचारी,  प्रधान साहब के ठिकाने ढूंढ़ते हुए मुंबई और औरंगाबाद में धरना देने जातें? क्योंकि वें तो नांदेड़ आ नहीं रहे हैं. बताएं कि, क्या यह डेलीवेजस कर्मचारी, अपनी मांगें लेकर सेक्रेटरी साहब और मेंबर साहिबान के पास नहीं गए थे ? यदि साहब लोग, सोशल मीडिया पर फोटो डलवाकर भूल गए तो कर्मचारियों की क्या खता? बोर्ड में बैठें माई - बाप बताएं कि इन कर्मचारियों को अपनी मांगें लेकर हमारे पूज्य संतों के पास नहीं जाकर, क्या स्वामी बाबा रामदेव के पास जाना चाहिए था? 

मिनहास साहब ! आपके बोर्ड कार्यकाल में बोर्ड की बैठकें नहीं हो रहीं उसके लिए कर्मचारी वर्ग जिम्मेदार हैं क्या? आपके बोर्ड में बगैर मीटिंग के बहुत सारे काम हुए हैं और अभी भी हो रहे हैं. बगैर मीटिंग के कर्मचारियों को ग्रेड दिए गए ऐसे भी उदाहरण हैं. प्रमोशन भी? महंगाई भत्ते भी? बगैर मीटिंग के हर महीने किसी न किसी काम या खरीदी के टेंडर भी जारी हो रहे हैं? प्रधान साहब और मीत प्रधान साहब, बोर्ड संचालन कार्य में किस तारीख को क्या हुआ हैं वो तो बोर्ड में ही दर्ज हैं. सुपरिन्टेन्डेन्ट साहब के पास सब लेखा-जोखा तो होगा ही. फिर इन कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने के विषय में पिछले तीन सालों से टालमटोल क्यों चल रहा हैं ? आपको सीधा सा उत्तर देना हैं कि इन कर्मचारियों की मांग आप पूर्ण करेंगे या नहीं? ताकि कर्मचारी वर्ग झूठी आस में ना रहें. कर्मचारियों के हिस्से में बार - बार हताशा ना आने पाए, इस विषय की जिम्मेदारी प्रधान साहब की हैं, सिर्फ प्रधान साहब की. जो काम सात मेंबर साहब की दस्तखत से पूर्ण होता हो उसके लिए अतिरिक्त भूमिका की आवश्यकता नहीं रह जातीं. बोर्ड मीटिंग की आस पर फार्मूला के तहत सुपरिन्टेन्डेन्ट साहब कर्मचारियों को पक्का करने का आदेश पत्र जारी कर, विषय को आनेवाले बोर्ड की मीटिंग के लिए प्रस्तावित कर सकते है. मन में करने की इच्छाशक्ति हो तो सब संभव है "साहब", पहल तो कीजिये !

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