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सोमवार, 24 जनवरी 2022


श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी की हजूरी में राजनीतिक द्वंद !

हरमीतसिंह कालका बनें दिल्ली कमेटी के प्रधान

रविंदरसिंघ मोदी 

गुरुद्वारा श्री रकाबगंज साहब में तिथि 23 जनवरी, 2022 के दिन श्री गुरु ग्रंथसाहिब की हजूरी में जो कुछ घटित हुआ उससे सिक्खी प्रतिमा को निश्चित ही आघात पहुँचा हैं. दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान के चुनाव को लेकर तीन गुटों के बीच जमकर राजनीतिक द्वंद देखने को मिला. सबसे दुःख इस बात का हो रहा हैं कि प्रधान पद के चुनाव करवाने हेतु श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी को सुबह 11 बजे के समय प्रकाशमान किया गया था और उनके सुखासन प्रक्रिया के लिए रात के 11 बज गए. गुरु ग्रंथसाहिब जी की इस घोर उपेक्षा के लिए किसको जिम्मेदार माना जाए? 12 घंटों की जद्दोजहद, संघर्ष, आरोप - प्रत्यारोप, पुलिस बल के दबावतंत्र के बीच आखिर शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीरसिंघ बादल समर्थित उम्मीदवार और भारतीय जनता पार्टी के नेता मनजिंदरसिंह सिरसा के दहिने हाथ कार्यकर्ता स. हरमीतसिंह कालका को दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का प्रधान चुन लिया गया. उन्हें 51 में से 29 वोट प्राप्त हुए. जबकि उनके विपक्षी उम्मीदवार स. परमजीतसिंह सरना को हार का सामना करना पड़ गया. 

बारह घंटों की राजनीतिक सरगर्मियों के चलते श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी का प्रकाश खुला रहा. वहीं झगड़े, फसाद, पुलिस बल प्रदर्शन और राजनीतिक खींच - ताण जारी रहीं. इन घटनाओं के वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहें हैं. जिसमें वो उपेक्षाओं के दृश्य स्पष्ट देखें जा सकते हैं. दिल्ली के सिख नेता फेसबुक लाइव के जरिये भी शिरोमणि अकाली दल और भाजपा की अंदरूनी साँठगाँठ पर आरोप जड़ते देखें जा रहें हैं. क्या चुनावों के लिए श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी के स्वरुप को प्रकाशमान करना आज के राजनीतिक युग में सार्थक है? चुनाव और मतदान तो एक्ट और सरकारी नियमों से करवाएं जाते हैं, वहां श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी को ले जाकर प्रकाशमान करने की प्रथा में बदलाव लाना चाहिए. 

 दिल्ली कमेटी के लिए प्रधान चुनने को लेकर रविवार के दिन कड़ाके की सर्दी के बीच राजनीतिक गर्माहट से सिख राजनीतिक पार्टियों ने जमकर अपने राजनीतिक हथकंडे दिखाए. निश्चित ही इन चुनावों की गतिविधियों का रिमोट भाजपा के नेता मनजिंदर सिरसा के हाथ रहा होगा. वह रिमोट भी "मेड इन अकाली दल" का रहा होगा. सिरसा भले ही आज भारतीय जनता पार्टी के नेता और कार्यकर्ता होंगे लेकिन उनकी पहली आस्था शिरोमणि अकाली दल ही हैं. पंजाब चुनाव और अन्य कुछ विषयों को लेकर मनजिंदरसिंह सिरसा भाजपा में गोटिया फीट करने के काम में सहायक की भूमिका अदा कर रहें हैं. इसलिए सरदार सुखबीरसिंह बादल द्वारा दिल्ली प्रबंधक कमेटी के चुनावों में अकाली दल का प्रधान बनाने के लिए सभी अधिकार गुप्त रूप से मनजिंदर सिंह सिरसा को सौंप दिए. सिरसा ने भी अपनी राजनीतिक कुशलता (साम दाम दंड भेद) का उपयोग कर सरदार हरमीतसिंह कालका को प्रधान बनाया हैं. अब शिरोमणि अकाली दल के नेतृत्ववाले प्रबंधन में पांचों तखतों के साथ साथ दिल्ली प्रबंधन समिती का नाम भी शामिल हो गया हैं. 

पंजाब में हो रहें विधानसभा चुनावों से पहले सुखबीर सिंह बादल को दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन दिखाना जरुरी था. इस वर्चस्व प्रदर्शन के कदम से शिरोमणि अकाली दल ने कांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी पर दबाव कसने का अपना राजनीतिक पैंतरा खेल लिया हैं. लेकिन उसके लिए गुरुद्वारा श्री रकाबगंज साहिब में जो घटनाक्रम घटित हुआ उसको देख कर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के गिरते राजनीतिक स्तर अंदाजा लग ही जायेगा. पंजाब विधानसभा सभा में शिरोमणि अकाली दल भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ रहीं हैं, लेकिन कहना नहीं होगा कि दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में शिरोमणि अकाली दल का प्रधान चुनकर लाने हेतु भाजपा पलकें बिछाएं मददगार साबित हुईं. 

विवाद का विषय : रविवार को दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के तत्वाधान में एक्ट 1971 के आधार से प्रधान चुनाव आयोजित किये गए थे. सुबह करीब 11 बजे चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ हुईं और चुनाव प्रक्रिया कक्ष में श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी को विधिवत रूप से प्रकाशमान किया गया कि चुनाव प्रक्रिया गुरु महाराज की पावन हजूरी में संपन्न हो. प्रधान पद के लिए शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार के रूप में सरदार हरमीत सिंह कालका और उनके विपक्ष उम्मीदवार के रूप में सरदार परमजीतसिंह सरना की उम्मीदवारी तय हुईं. शुरुआती दो मतदाताओं ने वोट डाले नहीं कि विवाद शुरू हो गया. यह चुनाव गुरुद्वारा एक्ट अनुसार गुप्त मतदान प्रक्रिया के तहत करवाने का प्रावधान हैं. लेकिन मतदाताओं द्वारा मतपत्रिका पर नाम दर्ज कर उसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किये जाने का मामला सामने आया. जिसके बाद सरदार परमजीतसिंह सरना, सरदार मंजीतसिंह जी. के. और उनके साथियों ने आक्षेप दाखिल किया. यहीं से विवाद खड़ा हो गया. बीच बचाव और हस्तक्षेप के लिए पुलिस बल को तैनात करना पड़ गया. जिस कक्ष में श्री गुरु ग्रन्थसाहिब प्रकाशमान थे वहां हाथापाई की नौबत बन गईं. यह विवाद और खींचतान रात के ग्यारह बजने तक चलती रहीं. तब तक ग्रंथीसिंघ गुरु ग्रंथसाहिब जी के स्वरुप को लेकर वहीं झगड़े फसाद के माहोल में बैठें रहें. आखिर रात ग्यारह बजे महाराज के स्वरुप संतोखणे का कदम उठाया गया. चुनाव संपन्न करवाने के लिए गुरु महाराज जी के प्रकाश करवाकर वहाँ सम्मान का पालन नहीं किया. यह संकेत दर्शाते हैं कि किस तरह से सत्ता की लालसा के मारे नेताओं ने गुरु ग्रंथसाहिब जी के अस्तित्व को उपेक्षित रखा !

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